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घेरण्ड संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 10
उदरे पश्चिमं तानं नाभेरूर्ध्वं तु कारयेत्‌ । उड्डान कुरुते यस्मादविश्रान्तं महाखगः । उट्टीयानं त्वसौ बन्धो मृत्युमातङ्गकेसरी ॥
उड्डीयान बंध - उदर में नाभि के ऊर्ध्वभाग को पश्चिम तान (द्वार) को समान रूप से सिकोड़ना चाहिये। अर्थात्‌ मध्यस्थ नाड़ीचक्र को सिकोड़कर उठाये। इसी को उड्डीयान बन्ध कहते हैं, गजरुप मृत्यु के लिये साक्षात्‌ सिहँ यही उड्डीयान बंध होता है।
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