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घेरण्ड संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 35
भूमौ शिरश्च संस्थाप्य करयुग्मं समाहितः । ऊर्ध्वपादः स्थिरो भूत्वा विपरीतकरी मता ॥
विपरीतकरी मुद्रा - भूमि पर सिर रखकर हाथों को नीचे रखकर पैरों को ऊर्ध्व करके विपरीतकरी मुद्रा मानी गयी है।
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