पुन: काकी मुद्रा से प्राणवायु को खींचकर अपान वायु में योजित करे। फिर सुधीजन षट् चक्रों का ध्यान करे और 'हुं' और 'हंस' इन दो मंत्रों से जो साक्षात् भुजंगिनी है, उस देवी (कुंडलिनी) को जगाये तथा जीव के सहित इस शक्ति (कुंडलिनी) को उठाकर सहस्रकमल (सहस्रारचक्र) में ले जाये।
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