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घेरण्ड संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 38
काकोभिः प्राणंसङ्कृष्य अपाने योजयेत्ततः । षट्चक्राणि क्रमाद्ध्यात्वा हुं हंसमनुना सुधीः ॥ चेतन्यमानयेद्देवीं निद्रिता या भुजङ्गिनी । जीवेन सहितां शक्तिं समुत्थाप्य कराम्बुजे ॥
पुन: काकी मुद्रा से प्राणवायु को खींचकर अपान वायु में योजित करे। फिर सुधीजन षट्‌ चक्रों का ध्यान करे और 'हुं' और 'हंस' इन दो मंत्रों से जो साक्षात्‌ भुजंगिनी है, उस देवी (कुंडलिनी) को जगाये तथा जीव के सहित इस शक्ति (कुंडलिनी) को उठाकर सहस्रकमल (सहस्रारचक्र) में ले जाये।
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