नाभ्िमूलेवसेत्सूर्यस्तालुमूले च चन्द्रमाः ।
अमृतं ग्रसते सूर्यस्ततो मृत्युवशो नरः ॥
विपरीतकरी मुद्रा - नाभि के मूल में सूर्य बसते हैं और तालु के मूल में चन्द्रमा। जब सूर्य अमृत को ग्रस लेता हैं तब नर मृत्यु के वश होता है।
(समीक्षा - (सूर्य नाभि में स्थित है तथा अमृत सहस्रारचक्र में (ब्रह्मरंध्र में) है। सूर्य द्वारा अमृतपान करने से मनुष्य की स्थिति में परिवर्तन हो जाता है।)
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