मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
घेरण्ड संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 33
नाभ्िमूलेवसेत्सूर्यस्तालुमूले च चन्द्रमाः । अमृतं ग्रसते सूर्यस्ततो मृत्युवशो नरः ॥
विपरीतकरी मुद्रा - नाभि के मूल में सूर्य बसते हैं और तालु के मूल में चन्द्रमा। जब सूर्य अमृत को ग्रस लेता हैं तब नर मृत्यु के वश होता है। (समीक्षा - (सूर्य नाभि में स्थित है तथा अमृत सहस्रारचक्र में (ब्रह्मरंध्र में) है। सूर्य द्वारा अमृतपान करने से मनुष्य की स्थिति में परिवर्तन हो जाता है।)
पूरा ग्रंथ पढ़ें
घेरण्ड संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

घेरण्ड संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें