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घेरण्ड संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 55
तदा वायुप्रबन्धेन कुम्भिका च भुजड्डिनी । बद्धश्वासस्ततो भूत्वा ऊर्ध्वमार्ग प्रपद्यते ॥
तब श्वास वायु को रोककर कुंभक श्वास को धारण करे तो कुंडलिनी उर्ध्वमार्ग की ओर प्राप्त होती है - उठती है।
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