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घेरण्ड संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 5
गोपनीयं प्रयत्नेन देयं यस्य कस्यचित्‌ । प्रीतिदं योगिनाञ्चेव दुर्लभं मरुतामपि ॥ ५
ये मुद्रायें गोपनीय हैं, जिस किसी योग्य-अयोग्य को ये देय नहीं हैं। योगियों के लिये प्रातिदायक तथा देवताओं के लिये भी ये दुर्लभ हैं। (समीक्षा - गोपनीय, अदेय, दुर्लभ आदि कहने के पीछे विशेष बात यह है कि हर कोई इन्हें कर ही नहीं सकता हैं। यदि सीख भी ले तो वह बिना नियम और व्यवस्था के और इन्हें या अज्ञानवश पवित्रता और समयादि के बिना करके इनसे लाभ की बजाय हानि ही उठायेंगे। अतएव अपात्र को ये मुद्रायें अदेय हैं। अनेक मुद्राओं की साधना भी कठिन है, जिन्हें देवसदृश जन भी करने में नियम का ध्यान नहीं रख पाते हैं। अत: मात्र योगीजन ही इन्हें कर पाते हैं, यह भाव हैं)
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