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घेरण्ड संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 87
कण्ठमग्ने जले स्थित्वा नासाभ्यां जलमाहरेत्‌ । मुखान्निर्गमयेत्‌ पश्चात्‌ पुनर्वक्त्रेण चाहरेत्‌ ॥
कण्ठ तक मग्न जल में स्थित होकर नासिकाछिद्रों से जल ग्रहण करे, पुन: मुख से निकाल दे तथा पुन: मुख से ग्रहण करना चाहिये।
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