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अध्याय 11 — एकादशोल्लासः

कुलार्णव
97 श्लोक • केवल अनुवाद
देवी ने कहा - हे कुलेश! मैं कुलाचारक्रम को सुनना चाहती हूँ। उसे मुझे बताइये।
हे देवि! सुनिए, जो आपने मुझसे पूछा है, उसे मैं बताऊँगा, जिसके सुनने मात्र से सब पशु पाशों से छुटकारा मिल जाता है।
यदि दीक्षाप्राप्त ज्येष्ठ व्यक्ति कुलपूजा से वर्जित हो, तो कनिष्ठ होते हुये भी यदि क्रम का ज्ञाता हो, तो वही कुलपूजा करे।
हे पार्वति! उसके पास जाकर उसे गुरुवत् नमस्कार करे। उसे सब कुछ निवेदित कर शेष को खाये।
पूजा के मध्य में गुरु, ज्येष्ठ या पूज्य के आने पर बैठे ही बैठे उन्हें नमस्कार शिष्टाचार करे और उनकी अनुमति लेकर कार्य करे।
एकत्र स्थित होने पर ज्येष्ठ और कनिष्ठ शिष्य का आचार इसी प्रकार कहा गया है। हे कुलनायिके! अन्य आचार पूर्ववत् ही होंगे।
अज्ञात कौलिक के आने पर परम्परा का निर्वाह करे। हे देवि! अपने गुरुदेव का स्मरण कर अपने अपने मार्ग से तर्पण करे।
नित्यार्चन दिन में करे और नैमित्तिक अर्चन रात्रि में। दोनों ही काम्य कर्म हैं, यह शास्त्रनिर्णय है।
स्नान किये बिना, या आसन पर बैठे बिना, या भोजन करके, या प्रलाप करते हुये, या गन्ध पुष्प, वस्त्रादि से अलंकृत हुये बिना, या शरीर में न्यास किये बिना कुलपूजा न करनी चाहिये।
मन्त्र के बिना पूजा, मांस के बिना तर्पण और शक्ति के बिना जो पान किया जाता है, हे प्रिये! वह निष्फल होता है।
श्री चक्रपूजा को अकेले न करे और न एक पात्र में पूजन करे। न एक हाथ से पूजा करे और न एक हाथ से पान करे।
हे देवि! पशु के निकट मत्स्य, मांस और आसव के द्वारा पूजन न करे। प्रणाम कर चक्र में प्रवेश करे और प्रणाम करके ही उससे बाहर जाय।
हे प्रिये! श्रीचक्र में न तो आसन पर खड़ा रहे और न वीरासन से बैठे। हे देवि! श्रीचक्र का दर्शन करने से नेत्रों के पाप नष्ट होते हैं। दर्शन न होने से कौलिक के दोनों नेत्र नेत्र न रहकर दो घाव से प्रतीत होते हैं।
चक्र में बैठी हुई शक्ति और कौलिकों के अनाचार सदाचार होते हैं हे देवि! पार्वती एवं शिवरूप में उन्हें मानना चाहिये। उनका अपमान न करे।
कुलाचार्य के घर में पहुँचे, तो पापों से मुक्त होने के लिये माँगकर भक्तिपूर्वक अमृत या अन्न अथवा उसके अभाव में जल पिये।
कुलाचार्य की शक्ति के द्वारा दिये गये पात्र को नमस्कार कर भक्ति के साथ ग्रहण करे, अन्यथा नरक जाना पड़ता है।
हे कुलेश्वरि! स्नान किए बिना, या बिना भक्ति, या लोभवश जो कुलद्रव्य का सेवन करता है, वह दरिद्रता को प्राप्त करता है।
पगड़ीधारी, नग्न, खुले बाल वाला, अन्य जन से आवृत, व्याकुल, क्रुद्ध और झगड़ालू व्यक्ति कुलामृत का सेवन न करे।
जो मद्यपात्र अनेक हाथों में घूमता है, जो मद्य उच्छिष्ट है और जिस मद्य को नली द्वारा पिया जाता है, उसका पान करने से देवता का शाप मिलता है।
हे प्रिये! एक आसन पर बैठने वाले, एक पात्र में भोजन करने वाले और एक पात्र में द्रव्यपान करने वाले नरक में जाते है।
यदि गुरुदेव, या उनका पुत्र, या उनके वंशज उसी ग्राम या नगर में निवास करते हैं, जहाँ कि साधक रहता है। हे महेशानि! जो उनकी अनुमति के बिना कुलद्रव्य का सेवन करता है, वह अक्षय नरक में जाता है।
हे पार्वति! चक्र में जूठे हाथों से कुलद्रव्यों को न छुए। बाहर दोनों हाथ धोकर कुलद्रव्यों को प्रदान करे। हे प्रिये! मद्यपात्र को उठाकर पात्र को न भरे। भोगपात्र को कभी सुराकुण्ड में न डाले। चक्र के मध्य में शुद्ध होने के विचार से जो हाच आदि धोता है, वह मूर्ख आपत्ति में पड़ता है।
श्री चक्र के मध्य में थूकना या जो मल, मूत्र एवं अधोवायु का विसर्जन करता है, वह योगिनियों का पशु बनता है।
चक्र के बीच में घट के टूटने, या पात्र के पृथ्वी पर गिरने, या दीपक के बुझने से जो दोष होता है, हे प्रिये । उसकी शान्ति के लिए पुनः श्री चक्रपूजा करानी चाहिए।
हे प्रिये! ज्ञानी लोग चक्र में जप करते हैं, ध्यान करते हैं, स्तवन करते हैं, प्रणाम करते हैं, उद्बोधन करते है, जिज्ञासा करते हैं और आनन्दित होते हैं।
अज्ञानी लोग चक्कर खाते हैं, चिल्लाते हैं, हँसते हैं, झगड़ा करते हैं, रोते हैं, स्त्रियों की इच्छा करते हैं और हे प्रिये! निन्दा करते हैं।
चक्र के मध्य में परिहास, प्रलाप, बहुत बातचीत, उदासी, भय और क्रोध न करे।
हे महादेवि! पात्र हाथ में लेकर चक्र के मध्य में भ्रमण न करे। हे प्रिये! पूर्णपात्र हाथ में देर तक ठहरा भी न रहे। हाथ में पात्र हो, तो बातचीत न करे। पात्र को तोड़े नहीं, पात्र को पैरों से न छुए और नीचे बिन्दु न गिराये।
हे प्रिये! एक हाथ से और बिना मुद्रा के पात्र न दे। पात्र को अपने स्थान से न हटाए और उसे अन्य पात्रों में न मिलावे।
शब्द करते हुये द्रव्य का पान न करे और न ही पात्र को भरते समय शब्द करे। एक दूसरे के पात्रों को टकराये नहीं और न पात्र को नीचे गिराये।
आधार के सहित पात्र को न उठाये और उसे आधार से अलग न रखे। हे प्रिये! पात्र को खाली न करे और उसे घुमाये नहीं।
हे प्रिये! बुद्धिमान पात्र को लाँघे नहीं और उसे ऊपर न उठाये। हे परमेश्वरि! पात्र को धोकर छिपा कर रख दे, यह आज्ञा है।
उल्लासयुक्त होकर कोई कौलिक यदि पशु का साथ करता है, या पशुशास्त्रों को पढ़ता है, या पशुस्त्रियों का सङ्ग करता है, या पशुप्रसङ्ग करता है, या पशुधर्म करता है, तो उसके धर्म, अर्थ, आयु, यश, पुण्य, ज्ञान एवं सुख आदि नष्ट हो जाते है।
श्रीचक्रस्थित कुलद्रव्य को जो अपनी इच्छा से, या लोभ से या भय से पशुओं को देता है, वह योगिनियों के द्वारा मारा जाता है।
चक्र के बीच में शत्रु के भी साथ वाद विवाद न करे। माता पिता के समान उसे देखे तथा उसके कठोर वचनों को भी सह ले।
अपने कुटुम्बी या प्यारे मित्र को देखकर जैसी प्रसन्नता होती है, वैसी ही प्रसन्नता कौलिकों को देखकर जिसे होती है, वह योगिनियों का प्रिय होता है।
'ब्रह्मा से स्तम्ब पर्यन्त सभी मेरे लिए गुरु सन्तुति के समान है, मैं सभी का शिष्य हूँ, पृथ्वीतल पर कौन मेरा पूज्य नहीं है?' - इस प्रकार जिसकी निश्चित बुद्धि है, वह हम दोनों का प्रिय होता है।
'मैं गुरु हूँ, मैं ज्येष्ठ हूँ, मैं ज्ञानी हूँ' - इस प्रकार गर्व करने वाले कौलिक नहीं होते।
श्री गुरुदेव, कुलशास्त्रों और पूजास्थानों को भक्तिपूर्वक हे देवि! 'श्री' से, उनके नामों को युक्त कर प्रणाम करे और तब उनकी महिमा का वर्णन करे।
हे प्रिये! जपकाल को छोड़कर गुरुदेव के नाम का उच्चारण न करे। 'श्रीनाथ, देव, स्वामी' - इन शब्दों से बातचीत में उनका उल्लेख करे।
श्रीगुरुपादुका, मुद्रा, मूलमन्त्र और अपनी पादुका शिष्य को छोड़कर हे देवेशि! अन्य किसी को न बताए।
हे प्रिये! परम्परा, आगम, आम्नाय, मन्त्राचार आदि सभी गुरुमुख से प्राप्त होने पर ही सफल होते हैं, अन्यथा नहीं।
हे प्रिये! आश्रयभूत शास्त्र की मूल पुस्तक को न बताये, नित्य भक्ति से उसकी पूजा करे और पशु के हाथ में उसे कभी न दे।
हे पार्वति! अपनी पत्नी के समान कुलशास्त्रों का सेवन करे और पशुशास्त्रों से पराई स्त्री के समान दूर रहे।
जिस प्रकार चमड़े में स्थित दूध उत्तम द्विजों के लिये अपेय है, उसी प्रकार कौलिकों को पशुमुख से धर्मोपदेश नहीं सुनना चाहिये।
जो कुलाचार को सुनते हैं और जो शास्त्रानुसार कहते हैं, वे दोनों हो साक्षात् योगिनी-वीर के सम्मिलन को प्राप्त करते हैं।
हे कुलेश्वरि! जो इस कुलधर्म में श्रद्धा नहीं रखते, वे प्रलय पर्यन्त नरक से छुटकारा नहीं पाते।
१. विवाहिता, २. रखी हुई, ३. मूल्य से खरीदी, ४. प्रेमबद्ध एवं ५. कामरता - ये पांच प्रकार की गुरुस्त्रियाँ है। गुरु के समान ही ये अलंध्य और पूज्य है।
गुरुशक्ति (गुरुपत्नी), वीरपत्नी (वीर की पत्नी), कुमारी, व्रतधारिणी, व्यङ्गाङ्गी (विकलाङ्गी), विकृताङ्गी (विकृत अन्नों वाली) और कुब्जिका (कुबड़ी) स्त्री की भी कामना न करे।
पुत्री, बहन, पौत्री, पुत्रवधू और अपनी प्रिया स्त्री को गुरु के सामने न करे और एक दूसरे का संग्रह भी न करे।
कृष्णांशुका, कृष्णवर्णा, कुमारी, मनोहरा, कृशोदरी युवती की देवतारूप में पूजा करनी चाहिए। बलपूर्वक कभी कुलयोगिनी का एक बार भी सेवन न करे। हे कुलसुन्दरि! चक्र में स्वयंक्षुब्धा की ही कामना करे।
कच्चा मांस, सुरा, कुम्भ, मत्त हाथी, सिद्धि चिह्न वाला आम और अशोक वृक्ष, क्रीडारत कुमारियाँ, (एक वृक्ष ?) श्मशान, स्त्रियों का समूह, रक्त वस्त्र नारी यदि दिखाई पड़ें, तो भक्तिपूर्वक उनकी बन्दना करे।
गुरु की शक्ति, गुरुपुत्र, ज्येष्ठ या कनिष्ठ कौल साधक, कुलदर्शन के शास्त्र, कुलद्रव्य, कौलों के प्रेरक, सूचक, वाचक, दर्शक, शिक्षक, बोधक, योगी, योगिनी, सिद्ध पुरुष, कन्या, कुमारी, नग्न या पागल स्त्री - इनमें से किसी की न कभी निन्दा करे, न हँसी उड़ाए, न अपमान करे, न अप्रिय कहे और असत्य बात न कहे। कुल साधक कुलस्त्री को कभी 'काली' या 'कुरूपा' न कहे।
भक्त वीरों के किये और न किये की कभी जाँच पड़ताल न करे। नग्न, पागल, प्रकटस्तनी स्त्री को न देखे। दिन में स्त्रीसङ्ग न करे, उसकी योनि को कभी न देखे।
संसार में जो भी स्त्री है, वह माता के समान है। स्त्रियों पर व्यतिक्रम (अत्याचार) करने से कुलयोगिनियाँ रुष्ट होती है। सौ अपराध करने पर भी स्त्रियों को पुष्प तक से न मारे। स्त्रियों के दोषों का कभी वर्णन न करे, अपितु उनके गुणों को ही प्रकाशित करे।
कुल योगिनियाँ सदा कुलवृक्षों में रहती है। अतः उनके पत्तों में, भोजन नहीं करना चाहिए, अपितु विशेष रूप से उनकी पूजा करनी चाहिए।
कुलवृक्ष के नीचे न तो सोये और न कोई उपद्रव करे। उसे देख या सुनकर भक्ति से नमस्कार करे। कभी उसे काटे नहीं।
१. श्लेष्मान्तक, २. करञ्च, ३. निम्ब, ४. अश्वत्थ, ५. कदम्ब, ६. बिल्व, ७. वट, ८. उडुम्बर और ९. तिन्तिडी - ये नौ कुलवृक्ष हैं।
१. प्रायश्चित, २. भृगुपात (पर्वत से गिर कर आत्महत्या), ३. संन्यास, ४. व्रतधारण, ५. तीर्थयात्रा - इन पाँच को कौल न करे।
१. वीरहत्या, २. वृथा पान, ३. वीरपत्नी सेवन, ४. वीरद्रव्य का हरण और ५. वीरद्रव्य का संयोग कौलिकों के लिय ये पाँच पाप है।
शैव मत में तत्त्व का परिज्ञान, गारुडविद्या में विषभक्षण, ज्योतिष में ग्रहण के विषय में पहले से भविष्यवाणी और कौल में अनुग्रह, प्राणिमात्र पर दया एवं (इन्द्रिय) निग्रह सार स्वरूप है।
देवता, गुरु और शास्त्रों के सिद्धाचार की विडम्बना तथा विद्या की चोरी करने वाला, गुरुद्रोही ब्रह्मराक्षस होता है।
गुरुवाक्य को तोड़कर, वीरों का अपमान कर, गुरु को डाट फटकार कर, वीर को तर्क के द्वारा हराकर और कुलशास्त्रों की उपेक्षा कर ब्रह्मराक्षस होता है।
हे प्रिये! एकाक्षर के देने वाले गुरुदेव की जो अवज्ञा करता है, वह कुत्ते आदि सौ योनियों में घूमता फिरता हुआ चाण्डाल होता है।
माता, पिता, पत्नी, भाई, बन्धु, पुत्र और कुल की निन्दा करने वाले को बिना सोचे विचारे ही मारे।
हे कुलेश्वरि! गुरु, देवता, कौलिक, कुलागम अथवा कुलधर्म की रक्षा के लिए, हे देवि! जो निन्दक को मारकर स्वयं अपने प्राणों को छोड़ता है, वह परम शिव में लीन होता है।
जहाँ एक दुराचारी के निधन से बहुतों का कल्याण होता हो, वहाँ उसका वध करने से पुण्य ही होता है।
श्रीचक्र का वृत्तान्तादि का गोपन श्री चक्र के शुभ अशुभ वृत्तान्त को कभी नहीं कहना चाहिए, हे परमेश्वरि यह आशा है।
हे प्रिये! कुलधर्म के प्रसङ्ग को पशुओं के सामने कभी न छेड़े, जिस प्रकार शूद्र के आगे वेद का पाठ करना मना है।
हे देवि! पीठक्षेत्र आगम, आम्नाय, उसकी विद्याओं, आचार, कौलिकों और कुलद्रव्यादि का वर्णन पशु के समीप न करे।
हे प्रिये! जिस प्रकार चोरों से धन धान्यादि की रक्षा की जाती है, उसी प्रकार पशुओं से कुलधर्म की रक्षा करे।
अन्दर से कौल, बाहर से शैव और लोगों के बीच वैष्णव - इस प्रकार हे देवि! नारियल के जल की भांति कौल को गुप्त रखे।
कुलधर्म आदि सबको सभी दशाओं में सदा प्रयत्नपूर्वक व्यभिचारिणी के गर्भ के समान गुप्त रखे।
वेदशास्त्र पुराण तो गणिका के समान स्पष्ट हैं किन्तु यह शाम्भवी विद्या कुलवधू के समान गुप्त है।
सुगुप्त कौलिकाचार योगी पर देवता अनुग्रह करते हैं, वाञ्छा सिद्धि प्रदान करते हैं किन्तु उस सिद्धि को प्रकट करने वाले योगी का नाश करते हैं।
हे कुलेशि! कुलशास्त्र के जो ज्ञाता कुलपूजा में परायण होकर एकान्त में आपकी सेवा करते हैं, वे आपके समीप रहते हैं।
बुद्धिमान गुरु को प्रकट करे, मन्त्र को यत्नपूर्वक गुप्त रखे। अप्रकाश्य को प्रकाशित करने से सम्पत्ति और आयु का नाश होता है।
सभी आचारों से भ्रष्ट कुलाचार का आश्रय ले सकता है किन्तु कुलाचार से भ्रष्ट रौरव नरक में जाता है।
महापापियों के उद्धार का उपाय शास्त्रों में मिलता है किन्तु कुल से भ्रष्ट होने वाले के उद्धार का उपाय कहीं नहीं दिखाई देता।
कुलधर्म का आश्रय लेकर जो कुलाचार का पालन नहीं करता, उस स्वेच्छाचारी महापापी को आपत्ति, पाप, रोग, दरिद्रता, कलह, भय, योगिनियों का कोप, पग-पग पर गिरता रहता है।
(जब वह गिरता है तब) चोट खाकर वह नांश को प्राप्त होता है। अति दुर्मति एवं तेजो रहित वह सर्वनिन्दित, व्याकुल और सबसे त्यक्त होकर एक देश से दूसरे देश को जाता है।
उसके कार्य की सदा हानि होती है क्योंकि वहाँ भी कुलमार्गस्था शाकिनियाँ जो कुलपालिका है, उन्हें खा जाती हैं क्योंकि पहले मैंने ही उन्हें बर दे रखा है।
अतः हे देवि! आचारवान् ही योगिनियों का प्रिय होता है। हे कुलेश्वरि! चतुर्वेदों के आचारों का जो पालन नहीं करते, उनका वे नाश करती है।
पादुका मात्र को ही सारतत्त्व समझने वाला सदाचारों से नियन्त्रित रहता है। सदाचार से ही देवत्व और योगिनी-वीर का सम्मिलन मिलता है। उसका उलटा करने से कौलिकों को तिर्यक योनि मिलती है।
यह आज्ञा द्वारा प्रमाणित है कि अनाचार से कौल नष्ट होता है और आचार पालन करने से आज्ञा सिद्धि मिलेगी, यह सत्य है।
सदाचार की प्रधानता न अभिषेक, न मन्त्र और न शास्त्र का पढ़ना आदि कुलधर्म का कारण है किन्तु हे कुलेश्वरि! सदाचार ही कुलधर्म का कारण है।
परा श्री पादुका, तत्त्वत्रय और आचारादि की भावना को जो जानता है हे शाम्भवि! वही 'समयाचार' से युक्त तथा कौलिक है।
जब तक 'समयाचार' का पालन नहीं करता, तब तक साधक कौलिक नहीं होता। समयाचार का पालन करने से देहावसान होने पर मोक्ष मिलता है।
संस्कार की हीनता, गुरुवाक्य की उपेक्षा और आचार की अवमानना करने से हे देवि! कौलिक का पतन होता है।
नित्य, नैमित्तिक, द्रव्य, मन्त्र, यन्त्रादि का न होना, अयोग्य पशुओं का कुसङ्ग, मन्त्र की सङ्करता, जान अनजान में गोपनीय का प्रकट होना आदि छोटे बड़े दोषों के पापों से हे प्रिये! पतन होता है।
गुरुदेव इस प्रकार के दोषी शिष्य को सभी पाप की शुद्धि के लिए देश, काल, आयु, धन सामर्थ्य का सम्यक् रूप से विचार कर विधि के अनुसार प्रायश्चित्त बताएँ।
शिष्य भी गरु द्वारा निर्दिष्ट प्रायश्चित्त को करे। अथवा गुरुदेव के नाम का जप करने से सभी पापों का प्रायश्चित्त हो जाता है।
जिस प्रकार अग्नि द्वारा सोने के कालुष्य की शुद्धि होती है, उसी प्रकार अनाचार की मलीनता को प्रायश्चित्त की अग्नि से जला डालना चाहिए।
हे पार्वति! यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ? सभी वर्णाश्रमों के लिए आचार ही सद्‌गतिदायक है।
हे कुलेश्वरि! गुरुदेव को तीन बार आचार का वर्णन करना चाहिए। उस पर भी यदि शिष्य उसका पालन नहीं करता, तो गुरु को पाप नहीं होता।
जिस प्रकार मन्त्री का दोष राजा को और पत्नी का दोष पति को लगता है, हे प्रिये! उसी प्रकार शिष्य का पाप गुरु को लगता है, इसमें सन्देह नहीं है।
हे कुलेश्वरि! इस प्रकार संक्षेप में मैंने कुलाचारी की विधि कही। अब हे देवि! आप क्या सुनना चाहती हैं?
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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