श्रीशास्त्राश्रयमूलञ्च पुस्तकं न वदेत् प्रिये ।
नित्यं समर्चयेद्भक्त्या पशुहस्ते न निक्षिपेत् ॥
हे प्रिये! आश्रयभूत शास्त्र की मूल पुस्तक को न बताये, नित्य भक्ति से उसकी पूजा करे और पशु के हाथ में उसे कभी न दे।
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