स्वचर्मस्थं यथा क्षीरमपेयं स्याद् द्विजोत्तमैः ।
तथा पशुमुखाद्धों न श्रोतव्यो हि कौलिकैः ॥
जिस प्रकार चमड़े में स्थित दूध उत्तम द्विजों के लिये अपेय है, उसी प्रकार कौलिकों को पशुमुख से धर्मोपदेश नहीं सुनना चाहिये।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।