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कुलार्णव • अध्याय 11 • श्लोक 45
स्वचर्मस्थं यथा क्षीरमपेयं स्याद् द्विजोत्तमैः । तथा पशुमुखाद्धों न श्रोतव्यो हि कौलिकैः ॥
जिस प्रकार चमड़े में स्थित दूध उत्तम द्विजों के लिये अपेय है, उसी प्रकार कौलिकों को पशुमुख से धर्मोपदेश नहीं सुनना चाहिये।
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