हे प्रिये! श्रीचक्र में न तो आसन पर खड़ा रहे और न वीरासन से बैठे। हे देवि! श्रीचक्र का दर्शन करने से नेत्रों के पाप नष्ट होते हैं। दर्शन न होने से कौलिक के दोनों नेत्र नेत्र न रहकर दो घाव से प्रतीत होते हैं।
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