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कुलार्णव • अध्याय 11 • श्लोक 13
श्रीचक्रे नासने तिष्ठेन्न च वीरासने प्रिये । श्रीचक्रदर्शने देवि नेत्रयोः पापनाशनम् । तन्नास्ति चेद् व्रणद्वन्द्वं कौलिकस्याक्षियुग्मकम् ॥
हे प्रिये! श्रीचक्र में न तो आसन पर खड़ा रहे और न वीरासन से बैठे। हे देवि! श्रीचक्र का दर्शन करने से नेत्रों के पाप नष्ट होते हैं। दर्शन न होने से कौलिक के दोनों नेत्र नेत्र न रहकर दो घाव से प्रतीत होते हैं।
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