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कुलार्णव • अध्याय 11 • श्लोक 96
मन्त्रिदोषश्च राजानं जायादोषः पतिं यथा । तथा प्राप्नोत्यसन्देहं शिष्यपापं गुरुं प्रिये ॥
जिस प्रकार मन्त्री का दोष राजा को और पत्नी का दोष पति को लगता है, हे प्रिये! उसी प्रकार शिष्य का पाप गुरु को लगता है, इसमें सन्देह नहीं है।
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