एकाक्षरप्रदातारं यो गुरुञ्चावमानयेत् ।
श्वानं योनिशतं गत्वा चण्डालत्वमवाप्नुयात् ॥
हे प्रिये! एकाक्षर के देने वाले गुरुदेव की जो अवज्ञा करता है, वह कुत्ते आदि सौ योनियों में घूमता फिरता हुआ चाण्डाल होता है।
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