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कुलार्णव • अध्याय 11 • श्लोक 34
श्रीचक्रस्थं कुलद्रव्यं यः पशुभ्यः प्रयच्छति । स्नेहाल्लोभाद्भयाद्वापि स भवेद् योगिनीपशुः ॥
श्रीचक्रस्थित कुलद्रव्य को जो अपनी इच्छा से, या लोभ से या भय से पशुओं को देता है, वह योगिनियों के द्वारा मारा जाता है।
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