पादुका मात्र को ही सारतत्त्व समझने वाला सदाचारों से नियन्त्रित रहता है। सदाचार से ही देवत्व और योगिनी-वीर का सम्मिलन मिलता है। उसका उलटा करने से कौलिकों को तिर्यक योनि मिलती है।
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