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कुलार्णव • अध्याय 11 • श्लोक 84
पादुकामात्रसारज्ञः सदाचारेषु यन्त्रितः । सदाचारेण देवत्वं योगिनीवीरमेलनम् । सम्प्राप्नुवन्ति तिर्यक्त्वं कौलिकास्तद्विपर्ययात् ॥
पादुका मात्र को ही सारतत्त्व समझने वाला सदाचारों से नियन्त्रित रहता है। सदाचार से ही देवत्व और योगिनी-वीर का सम्मिलन मिलता है। उसका उलटा करने से कौलिकों को तिर्यक योनि मिलती है।
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