शैव मत में तत्त्व का परिज्ञान, गारुडविद्या में विषभक्षण, ज्योतिष में ग्रहण के विषय में पहले से भविष्यवाणी और कौल में अनुग्रह, प्राणिमात्र पर दया एवं (इन्द्रिय) निग्रह सार स्वरूप है।
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