ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं यस्य मे गुरुसन्ततिः । यस्य मे सर्वशिष्यस्य को न पूज्यो महीतले । इति निश्चितबुद्धिर्यः स भवेदावयोः प्रियः ॥
'ब्रह्मा से स्तम्ब पर्यन्त सभी मेरे लिए गुरु सन्तुति के समान है, मैं सभी का शिष्य हूँ, पृथ्वीतल पर कौन मेरा पूज्य नहीं है?' - इस प्रकार जिसकी निश्चित बुद्धि है, वह हम दोनों का प्रिय होता है।
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