उच्छिष्टो न स्पृशेच्चक्रे कुलद्रव्याणि पार्वति । बहिः प्रक्षाल्य च करौ कुलद्रव्याणि दापयेत् ॥ मद्यभाण्डं समुधृत्व न पात्रं पूरयेत् प्रिये । भोगपात्रं सुराकुण्डे निक्षिपेन्न कदाचन ॥ चक्रमध्ये शुचिधिया करप्रक्षालनादिकम् । यः करोति हि मूढात्मा स भवेदापदाम्पदम् ॥
हे पार्वति! चक्र में जूठे हाथों से कुलद्रव्यों को न छुए। बाहर दोनों हाथ धोकर कुलद्रव्यों को प्रदान करे। हे प्रिये! मद्यपात्र को उठाकर पात्र को न भरे। भोगपात्र को कभी सुराकुण्ड में न डाले। चक्र के मध्य में शुद्ध होने के विचार से जो हाच आदि धोता है, वह मूर्ख आपत्ति में पड़ता है।
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