न स्वपेत् कुलवृक्षाधो न चोपद्रवमाचरेत् ।
दृष्ट्वा भक्त्या नमस्कुर्याच्छेदयेन्न कदाचन ॥
कुलवृक्ष के नीचे न तो सोये और न कोई उपद्रव करे। उसे देख या सुनकर भक्ति से नमस्कार करे। कभी उसे काटे नहीं।
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