संसार में जो भी स्त्री है, वह माता के समान है। स्त्रियों पर व्यतिक्रम (अत्याचार) करने से कुलयोगिनियाँ रुष्ट होती है। सौ अपराध करने पर भी स्त्रियों को पुष्प तक से न मारे। स्त्रियों के दोषों का कभी वर्णन न करे, अपितु उनके गुणों को ही प्रकाशित करे।
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