शिष्योऽपि गुरुणाऽऽज्ञप्तं प्रायश्चित्तं समाचरेत् ।
अथवा सर्वपापानां गुरुनामजपः स्मृतः ॥
शिष्य भी गरु द्वारा निर्दिष्ट प्रायश्चित्त को करे। अथवा गुरुदेव के नाम का जप करने से सभी पापों का प्रायश्चित्त हो जाता है।
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