गुरुस्त्रिवारमाचारं कथयेच्च कुलेश्वरि ।
न गृह्णाति हि शिष्यश्चेत्तदा पापं गुरोर्न हि ॥
हे कुलेश्वरि! गुरुदेव को तीन बार आचार का वर्णन करना चाहिए। उस पर भी यदि शिष्य उसका पालन नहीं करता, तो गुरु को पाप नहीं होता।
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