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कुलार्णव • अध्याय 11 • श्लोक 42
पारम्पर्यागमाम्नायं मन्त्राचारादिकं प्रिये । सर्व गुरुमुखाल्लब्धं सफलं स्यान्न चान्यथा ॥
हे प्रिये! परम्परा, आगम, आम्नाय, मन्त्राचार आदि सभी गुरुमुख से प्राप्त होने पर ही सफल होते हैं, अन्यथा नहीं।
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