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कुलार्णव • अध्याय 11 • श्लोक 51
कृष्णांशुकां कृष्णवर्णा कुमारीञ्च कृशोदरीम् । मनोहरां यौवनस्थामर्चयेद्देवताधिया ॥ एकदापि न सेवेत बलेन कुलयोगिनीम् । चक्रमध्ये स्वयं क्षुब्धां कामयेत् कुलसुन्दरि ॥
कृष्णांशुका, कृष्णवर्णा, कुमारी, मनोहरा, कृशोदरी युवती की देवतारूप में पूजा करनी चाहिए। बलपूर्वक कभी कुलयोगिनी का एक बार भी सेवन न करे। हे कुलसुन्दरि! चक्र में स्वयंक्षुब्धा की ही कामना करे।
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