यथास्त्रीपुत्रमित्रादि दृष्ट्वा चेतः प्रहृष्यति ।
तथा चेत् कौलिकान् दृष्ट्वा स भवेद् योगिनीप्रियः ॥
अपने कुटुम्बी या प्यारे मित्र को देखकर जैसी प्रसन्नता होती है, वैसी ही प्रसन्नता कौलिकों को देखकर जिसे होती है, वह योगिनियों का प्रिय होता है।
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