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कुलार्णव • अध्याय 11 • श्लोक 81
भ्रंशमानः प्रनष्टश्च तेजोहीनोऽतिदुर्मतिः । निन्दितः सर्वविद्विष्टो विह्नलः सङ्गवर्जितः । देशाद्देशान्तरं याति कार्यहानिश्च सर्वदा ॥
(जब वह गिरता है तब) चोट खाकर वह नांश को प्राप्त होता है। अति दुर्मति एवं तेजो रहित वह सर्वनिन्दित, व्याकुल और सबसे त्यक्त होकर एक देश से दूसरे देश को जाता है।
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