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कुलार्णव • अध्याय 11 • श्लोक 28
पात्रहस्तो महादेवि न भ्रमेच्चक्रमध्यतः । पूर्णपात्रं करे कृत्वा न तिष्ठेत्तु चिरं प्रिये ॥ नालपेत् पात्रहस्तः सन् न भिन्द्यात् पात्रमम्बिके । पादाभ्यां न स्पृशेत् पात्रं न बिन्दु पातयेदधः ॥
हे महादेवि! पात्र हाथ में लेकर चक्र के मध्य में भ्रमण न करे। हे प्रिये! पूर्णपात्र हाथ में देर तक ठहरा भी न रहे। हाथ में पात्र हो, तो बातचीत न करे। पात्र को तोड़े नहीं, पात्र को पैरों से न छुए और नीचे बिन्दु न गिराये।
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