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अध्याय 86 — अथ शाकुनाध्यायः
बृहत्संहिता
83 श्लोक • केवल अनुवाद
शुक्र, इन्द्र, बृहस्पति, कपिष्ठल मुनि, गरुड़, भागुरि, देवल-इनके मत को देख- कर ऋषभाचार्य ने
जो कहा है, भारद्वाज मुनि के मत को देखकर अवन्ती के महाराजाधिराज राजा श्रीद्रव्यवर्धन ने
जो कहा है, संस्कृत और प्राकृत भाषा में जो सप्तर्षियों का मत है और गर्ग आदि यात्राकारियों ने जो कहा है
उन सबको देखकर वराहमिहिर ने शिष्यों की प्रसत्रता के लिये उत्तम ज्ञानयुत शाकुनसंग्रह किया है।
मनुष्यों के पूर्वजन्मार्जित जो शुभाशुभ कर्म होते हैं, उन कर्मों के शुभाशुभ फल को गमनकालिक शाकुन प्रकाशित करता है।
गाँव में रहने वाले, वनचर, जलचर, पृथ्वीचर, आकाशचर, दिनचर, रात्रिचर और उभयचर जीवों के शब्द, गमन, दृष्टि और उक्ति से पुरुष, स्त्री और नपुंसक का ग्रहण करना चाहिये।
पृथक् जाति और अनवस्था के कारण इनमें व्यक्ति (स्त्री, पुरुष और नपुंसक) का विभाग नहीं लक्षित होता है; अतः इनके ज्ञान के लिये ऋषियों ने ये वक्ष्यमाण दो श्लोक कहे हैं।
पृथक् जाति और अनवस्था के कारण इनमें व्यक्ति (स्त्री, पुरुष और नपुंसक) का विभाग नहीं लक्षित होता है; अतः इनके ज्ञान के लिये ऋषियों ने ये वक्ष्यमाण दो श्लोक कहे हैं।
पृथक् जाति और अनवस्था के कारण इनमें व्यक्ति (स्त्री, पुरुष और नपुंसक) का विभाग नहीं लक्षित होता है; अतः इनके ज्ञान के लिये ऋषियों ने ये वक्ष्यमाण दो श्लोक कहे हैं।
मोटे ऊँचे और विस्तीर्ण कन्धे वाले, विस्तीर्ण गरदन वाले, सुन्दर छाती वाले, अल्प गम्भीर स्वर वाले और स्थिर पराक्रम वाले जीव 'पुरुष' संज्ञक शाकुन कहे गये है। कुश छाती, शिर और गरदन बाले,
छोटे मुख, पाँव और पराक्रम वाले तथा मधुर शब्द करने वाले जीव 'स्त्री' संज्ञक शाकुन को गये हैं। पुरुष, खी दोनों के मिश्रित लक्षण जहाँ हों वे 'नपुंसक'-संज्ञक जोव कहे गये हैं।
गाँव में रहने वाले, वन में रहने वाले और उभयचारी शाकुनों को लोकव्यवहार से जानना चाहिये। संक्षेप की इच्छा वाला मैं (वराहमिहिर) अब यात्रा में प्रयोजनीय शाकुनों को कहता हूँ।
मार्ग में गमन करने वाले मनुष्य के ऊपर, सैन्य में राजा के ऊपर, पुर में देवता (नगर-स्वामी) के ऊपर, जन-समुदाय में प्रधान के ऊपर, प्रधानों के साम्य में जाति के ऊपर, जातियों के साम्य में विद्या के ऊपर और विद्या के साम्य में वयोधिक के ऊपर शाकुन का फल पड़ता है।
सूर्योदय से एक प्रहर दिन उठे तक ऐशानी दिशा मुक्तसूर्या, पूर्वदिशा प्राप्तसूर्या और अग्नि दिशा ऐष्यत्सूर्या होती है। एक प्रहर के बाद दो पहर दिन उठे तक पूर्वदिशा मुक्तसूर्या, आग्नेयी दिशा प्राप्तसूर्या और दक्षिण दिशा ऐष्यत्सूर्या होती है। इसी प्रकार शेष छ: प्रहरों में भी जानना चाहिये। मुक्तसूर्या अङ्गारिणी', प्राप्तसूर्या 'दीप्ता', ऐष्यत्सूर्या 'पूमिनी' और शेष पाँच दिशायें 'शान्ता' कहलाती हैं।
अङ्गारिणी दिशा के पञ्चमी दिशा में इह शुभाशुभ शकुन का फल भूत, दीप्ता दिख के पक्रमी दिशा में दृष्ट शुभाशुभ शकुन का फल वर्तमान और भूमिनी दिशा के पहनी दिशा में गृह शुभाशुभ शकुन का फल भविष्यत् होता है। शेष अङ्गारित सान्तासभ और भूषित शान्तासन दिशाओं में दृष्ट शुभाशुभ शकुन का फल क्रम से भूत और भविष्यत् जानना चाहिये ।
समीप तथा नीच स्थान में स्थित शकुन का फल शीघ्र तथा तथ्य और दूर में स्थित शकुन का फल देर से प्राप्त होता है। बढ़ने वाले स्थान पर दृष्ट शुभाशुभ सकुन कापस बढ़ने वाला और घटने वाले स्थान पर दूर सुभाशुभ शकुन का फल घटने काय होता है।
क्षण (दारुण और उग्रसंज्ञक नक्षत्र के मुर्त) में दृष्ट शकुन क्षणदीप्त; तिथियों ( चतुर्यो, षष्ठी, अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी) में दृष्ट शकुन तिथिदीप्त; नक्षत्रों (मूल) ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, पूर्वात्रय, भरणी और मघा में दृष्ट शकुन नक्षत्रदीप्त; वात ( भयंकर, खर, कठोर और प्रतिलोम वायु) में दृष्ट शकुन वायुदीप्त एवं सूर्याभिमुख स्थित शकुन सूर्यदीप्त-ये पाँच देवदीप्त हैं। ये सभी दीप्त यथोत्तर क्रम से दीप्त हैं; जैसे-क्षणदीप्त से तिथिदीप्त, तिथिदीप्त से नक्षत्रदीप्त, नक्षत्रदीप्त से वायुदीप्त और वायुदोप्त से सूर्यदीप्त अधिक दीप्त है। गति, स्थान, भाव, स्वर और चेष्टा-ये क्रिया- दीप्त हैं। ये भी यथोत्तर क्रम से दीप्त होते हैं।
पूर्वोक्त दश प्रकार के शान्त शकुन हैं। उनमें तृण और फल को खाने वाले सौम्य, मांस और विष्ठा आदि अपवित्र पदार्थ को खाने वाले रौद्र और अन्न को खाने वाले मिश्र (न सौम्य न रौद्र) कहे गये हैं।
महल, देवमन्दिर, मंगलस्थान (देवता, ब्राह्मण और गायों से अध्यासित) मनोज्ञ ( हरी घास और शीतल दूम की छाया), मधुर फल वाले, दूध वाले, फल वाले और फूल वाले वृक्ष- इन सब पर स्थित शकुन शुभ फल देने वाले होते हैं।
महल, देवमन्दिर, मंगलस्थान (देवता, ब्राह्मण और गायों से अध्यासित) मनोज्ञ ( हरी घास और शीतल दूम की छाया), मधुर फल वाले, दूध वाले, फल वाले और फूल वाले वृक्ष- इन सब पर स्थित शकुन शुभ फल देने वाले होते हैं।
दिन में दिनचर शकुन पर्वत के ऊपर और रात्रि में रात्रिचर शकुन जलप्राय देश में स्थित हों तो बली होते हैं तथा नपुंसक से स्त्री और खी से पुरुष जाति का शकुन बली होता है।
यदि दो आदि शकुनों का दर्शन हो तो गति, जाति, बल, स्थान, हर्ष सत्त्व, स्वर- इनमें जो बली हो, उसी के अनुसार शुभाशुभ फल प्राप्त होता है। अपने स्थान से अनुलोम गति वाले शकुन बली होते हैं; लेकिन इनसे विपरीत होने पर सभी शकुन निर्बल होते हैं।
मुर्गा, हाथी, पिरिली (पक्षिविशेष), मयूर, खदिरचञ्नु, छिक्कर (मृग जाति), सिंहनाद ( पक्षिविशेष), कराायिका-ये सभी पूर्व दिशा में बली होते हैं।
सियार, उल्लू, तोता, कौआ, चकवा, चकई, भालू, उलूक, चेटिका, कबूतर, रोना, चिल्लाना, क्रूर शब्द- ये सभी दक्षिण दिशा में बली होते हैं।
गाय, खरहा, क्रौरा पक्षी, लोमड़ी, हंस, कुरव पक्षी, कपिञ्जल पक्षी, मार्जार, विवाह आदि उत्सव, बाजे, गीत, हास्य- ये सभी पश्चिम दिशा में बली होते हैं।
दार्याघाट पक्षी, हरिण, चूहा, मृग, घोड़ा, गदहा, कोयल, चाष, बिल में रहने वाले जीव, पुण्याहवाचन का शब्द, घण्टा, शंख-ये सभी उत्तर दिशा में बली होते हैं।
वन में गाँव के शकुन, गाँव में वन के शकुन, रात्रि में दिन के शकुन और दिन में रात्रि के शकुन का ग्रहण नहीं करना चाहिये।
द्वन्द्व ( सारसभित्र नर-मेदिन का जोड़ा), रोग से पीड़ित, भीत, कलह करने की इच्छा वाले, मांसाभिलाषी, नदी के दूसरे किनारे पर स्थित और ऋतुकाल के कारण सदर्प शकुनों का ग्रहण नहीं करना चाहिये।
शिशिर काल में रोहित मृग, घोड़ा, बकरा, गदहा, कुरङ्ग, ऊँट, मृग और खरहा तथा बसन्त काल में कौना और कोयल निष्फल होते हैं।
भाद्रपद मास में सूअर, कुत्ता, भेड़िया आदि (बिल में रहने वाले जन्तु) का, शरत्काल में पानी से उत्पन होने वाले पक्षी बगुला आदि, गाय और क्रौस पक्षी का तथा श्रवण मास में हाथी और चातक का ग्रहण नहीं करना चाहिये।
हेमन्त में बाप, भालू, बन्दर, चीता, पैसा, साँप और मनुष्य को छोड़कर समस्त शिशु निष्फल होते हैं।
पूर्व और अग्निकोण के अन्तर्गत प्रदेश के त्रिभाग में प्रदक्षिण क्रम से कोशाध्यक्ष, अग्निजीवों और तपस्यों-ये तीन स्थितचे हैं।
दक्षिण और अग्निकोण के अन्तर्गत प्रदेश के त्रिभाग में क्रम से कारीगर, भिक्षुक और नङ्गी ली- ये तीन स्थित होते हैं। दक्षिण और नैऋत्य कोण के अन्तर्गत प्रदेश के त्रिभाग में क्रम से हाथी, गोप और धार्मिक लोग स्थित लोग हैं ।
पश्चिम और नैऋत्य कोण के अन्तर्गत प्रदेश के त्रिभाग में क्रम से लौ, प्रसूता ती और चोर स्थित रहते हैं। वायज्य और पश्चिम दिशा के अन्तर्गत प्रदेश के विभाग में कलाल, पक्षी को मारने वाले और हिंसा करने वाले स्थित रहते है।
वायव्य और उत्तर दिशा के अन्तर्गत प्रदेश के त्रिभाग में क्रम से विष करे नाश करने वाले, गौस्वामी (गोमान्) और इन्द्रजाल विद्या जानने वाले स्थित रहते हैं। उता और ईशान कोण के अन्तर्गत प्रदेश के त्रिभाग में धनी, दैवज्ञ और माली ये तीन स्थित रहते हैं।
ईशान कोण और पूर्व दिशा के अन्तर्गत प्रदेश के त्रिभाग में क्रम से वैष्णव, चरक एवं सहीस- ये तीन स्थित रहते हैं। इस प्रकार पूर्व आदि आठ दिशाओं के बतीस भेद होते हैं।
पूर्व आदि आठ दिशाओं के प्रदक्षिणक्रम से राजा, कुमार, सेनापति, दूत, सेठ, गुप्तचर, ब्राह्मण और गनाध्यक्ष-ये आठ तथा पूर्व आदि चार दिशाओं के क्षत्रिय आदि ( क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ब्राह्मण) चार अधिपति होते हैं।
यात्रा में गमन करते हुये या एक स्थान पर स्थित पुरुष के जिस दिशा में स्थित होकर शकुन शब्द करे, उस दिशा में स्थित प्राणी के साथ समागम कहना चाहिये। जैसे पूर्व और आग्नेय कोण के प्रथम त्रिभाग में शकुन हो तो कोशाध्यक्ष, द्वितीय में हो तो अग्निजीवी, तृतीय त्रिभाग में तापस इत्यादि के साथ समागम कहना चाहिये।
विषम, भयंकर, दीन, जर्जर (फूटते हुये भाण्ड से उत्पन्न)- ये सभी शब्द शुभ नहीं होते। अर्काभिमुख होकर, मधुर स्वर से और हर्षपूर्वक किये हुये सभी शब्द शुभ होते हैं।
सियार, पोतकी, कलहकारिका, छछुन्दर, उलूकचेटिका, पल्ली, सूअर, कोयल, पुरुषसंज्ञक जन्तु-ये सभी गमन करने वाले के बाँयों तरफ शुभ होते हैं।
भासपक्षी, भषक, वानर, श्रीकर्ण पक्षी, धिक्कर (मृग जाति), बाज, खोसंत्तक जन्तु-ये सभी गमन करने वाले के दक्षिण भागगत शुभ होते हैं।
श्वेत (मुख का शब्द), आस्फोट (हाथों का शब्द), पुण्याह शब्द, शंख का शब्द, जल का शब्द, तुरही का शब्द और वेदध्वनि-ये सभी पुरुष की तरह (याम- भागस्यित) शुभ होते हैं तथा अन्य मांगलिक शब्द श्रीवत् (दक्षिण भागस्थित ) शुभ होते हैं।
यात्रा में मध्यम, षड्ज, गान्धार- ये तीनों स्वर शुभ और षड्न, मध्यम, पान्थर, अषप-ये चार स्वर हितकारी होते है।
भारद्वाज, बकरा, मपूर-इन शब्द कीर्तन और देखना धन्य है तथा नेता, चाप और घरट-इनका आगे में आना अग्रुप है।
यात्रा के समय में जाहक, सर्प, खरगोश, सूअर और गोह का नाम लेना शुभकारी है। इससे उलटा वानर तथा भालू का फल होता है। अर्थात् यात्रा-समय में वानर तथा भालू का नाम लेना अशुभ तथा शब्द और ईर्जन शुभ है।
विषमसंख्यक ( १, ३, ५, ७ आदि) मृग, नकुल और अण्डज प्राणी वाम पार्ड से आगे आकर दक्षिण पार्श्व में आ जायें तथा नकुल के साथ चाप पक्षी दक्षिण पाचं से आकर वाम पार्श्व में आ जायें तो शुभ होते हैं। मृगु का मत है कि, ये सभी अपराह्न में शुभकारी होते हैं, पूर्वाह में नहीं।
दिन में सियार, करापिका और पिरलों पक्षी दक्षिण भाग में शुभ होते हैं तथा दंष्ट्री (सुअर आदि) और बिल में रहने वाले प्राणी वाम भाग में शुभ होते हैं।
पूर्व में घोड़ा और सफेद वातु, दक्षिण में शव और मांस, पश्चिम में कन्या और दही तथा उत्तर में गाय, ब्राह्मण और सज्जन पुरुष श्रेष्ठ होते हैं।
पूर्व में जाल के साथ चलने वाले और कुते के साथ चलने वाले, दक्षिण में शख और अधिक, पडिप में आसव (मद्य आदि) और नपुंसक तथा उत्तर में आसन और हल अशुभ होते हैं।
कर्भर (जो करते हैं), संगम ( किसी वृद्ध आदि के साथ संयोग) युद्ध, प्रवेश (गृहप्रवेश आदि) और नह द्रब्य के अन्वेषण में यात्रा में कथित प्रदेश से विरुद्ध प्रदेश में स्थित शकुन शुभ होता है। जैसे यात्रा में जो दक्षिण में शुभ है ये यहाँ पर नाम में, यात्रा में जो चाम में शुभ हैं से यहाँ पर दक्षिण में, यात्रा में जो आगे में शुभ हैं ये यहाँ पर पीछे में, यात्रा में जो पीछे में शुभ हैं वे यहाँ पर आगे में, यात्रा में जो पूर्व दिशा में शुभ हैं ये यहाँ पर पश्चिम में, पात्रा में जो पश्चिम में शुभ हैं वे यहाँ पर पूर्व में, यात्रा में जो दक्षिण में शुभ हैं वे यहाँ पर उत्तर में और यात्रा में जो उत्तर में शुभ है ये यहाँ पर दक्षिण में शुभ होते हैं।
दिन में पूर्वोक्त कर्म आदि करना हो तो यहाँ पर कुरङ्ग, रुरु (मृगनाति) और चार को; पूर्वाद्ध में चाय, वहुल और मुर्गा को तथा रात्रि के अन्त
अन्त भाग में नाजूक, उल्लू और पिङ्गता को यात्रा की तरह यह करना चाहिये, किन्तु खियों के लिये उपर्युक्त समस्त शकुन विपरीतक्रमण करना चाहिये।
यात्रा में जो वाम और दक्षिणगत शकुन शुभ हैं, वे राजा के दर्शन, गृहप्रवेश आदि, पर्वतप्रवेश, वनप्रवेश और नदी के पार होने में क्रम से आगे और पीछे में शुभ होते हैं। जैसे-यात्रा में जो वाम में शुभ हैं, वे यहाँ पर आगे में और यात्रा में जो दक्षिण में शुभ 'हैं, वे यहाँ पर पीछे में शुभ होते हैं।
क्रियादीप्ति में गमन करने वाले के पार्च में शकुन दिखाई दे तो 'परिभ' संज्ञक शकुन होता है।
परिपसंजक शकुन होने पर गेमन करने वाले का नाश होता है; किन्तु वे दोनों शकुन यथाभाग (दक्षिण भागे वाले दक्षिण भाग में और वाम भाग वाले वाम भाग में) स्थित होकर शान्तिपूर्वक शब्द करें तो 'शकुनद्वार' संज्ञक होते हैं। इनमें गमन करने वाले के अभीष्ट अर्थ की सिद्धि होती है।
किसी का मत है कि एक जाति वाले, शान्त चेष्टा से शब्द करने वाले, दोनों पार्श्व में स्थित शकुनों से शकुनद्वार संज्ञक शकुन बनता है।
यदि यात्रा के समय एक शकुन यात्रा करने की आज्ञा दे और दूसरा निषेध करे तो वह 'विरोध'संज्ञक शकुन अशुभ फल देने वाला होता है अथवा उन दोनों में जो बली हो, उसका ग्रहण करना चाहिये।
यदि यात्राकाल में पहले प्रवेशकात्तिक शकुन होकर बाद में पाशकालिक शकुन हो तो सुखपूर्वक कार्य की सिद्धि होती है तथा गृहप्रवेश आदि काल में इसके विपरीत (पहले शकुन होकर बाद में प्रवेशकालिक शकुन हो तो सुखपूर्वक कार्य की सिद्धि होती है।
जो शकुन पहले शुभ पेश करके बाद में यात्रा र निषेध करे तो यह शत्रु द्वारा गमन करने पाले भी मृत्यु, शत्रकलह या रोग को सूचित करता है।
दोप्त दिशा में स्थित होकर बाई तरफ कुन हो से भयको सूचित करता है तथा कार्य के शाम्भ में ही दीप्त शकुन दिखाई दे तो एक वर्ष तक उस कार्य में भय को अभिमत का है।
तिथि, आयु, मधात्र, सूर्य, स्थान और चेहादीप्त हो जो क्रम से थर, सैन्य, बल, अंग, ए और कर्म के लिये भकारी होते हैं।
मेध की ध्वनि से दीप्त शकुन वायु से भय और दोनों न्याओं में दीप्त शकुन रात्र से भय उत्पन करता है।
याँद शकुन थिला, केश और कपाल पर बैठे हों तो से मृत्यु अन्न और बच को करने वाले होते है तथा औराम पर बेते हो तो से कर उदय और दुःख देने वाले होते है।
यदि कुमारपातु पर बैठे होते कार्य की द्धि और पत्थर पर बेड़े होते हैं। वेदों के कल है। शान्त कुन बहुत कम अशुभ देते होते हैं・・
मल का त्याग करने वाले और भोजन करने वाले शकुन क्रम से कार्य की असिद्धि और सिद्धि करने वाले होते हैं। यदि शब्द करते हुये शकुन अपने स्थान से चले जायें तो गमन और पुनः अपने स्थान पर आकर बैठ जायें तो किसी के आगमन को सूचित करते हैं।
वीजन में कहानी में और पहले जोर से शब्द करके बाद में मन्द हो जाएँ तो दोष करने वाले होते हैं।
यदि एक स्थान पर स्थित शकुन दीप्त होकर सात दिन तक शब्द करता रहे तो गाँव के नाश को, दो मास तक शब्द करता रहे तो पुर के घात को, तीन मास तक शब्द करता रहे तो देश के घात को और एक वर्ष तक शब्द करता रहे तो राजा के घात को सूचित करता है।
सर्प, चूहा, बिल्ली और मछली के अतिरिक्त कोई भी शकुन
खच्चर की उत्पत्ति को (घोड़े के साथ गदहे के मैथुन से खच्चर की उत्पत्ति होती है, उसको) तथा मनुष्यों के अजाति मैथुन को छोड़कर कोई शकुन अन्य जाति के साथ मैथुन करे तो देश का नाश होता है।
पाद, ऊरु और शिर के निकट होकर शकुन चला जाय तो क्रम से बन्धन, पात और भय को सूचित करता है। घास खाता हुआ शकुन दिखाई दे तो दोष उत्पत्र करने बाला, जल पीता हुआ दिखाई दे तो वर्षा करने वाला, मांस खाता हुआ दिखाई दे तो अंगक्षत करने चाला और अन खाता हुआ शकुन दिखाई दे तो किसो बन्यु का समागम कराने वाला होता है।
दीप्त दिशा में स्थित शकुन क्रूर के साथ किसी पुरुष का आगमन, धूमित दिशा में स्थित शकुन दण्ड के साथ किसी पुरुष का आगमन, शान्त दिशा में स्थित शकुन दोष- युक्त पुरुष के साथ किसी पुरुष का आगमन, इसके बाद दुष्ट पुरुष के साथ, इसके बाद प्रधान पुरुष के साथ, इसके बाद राजा के साथ, इसके बाद आषक के साथ और इसके बाद अङ्गारित दिशा में स्थित शकुन बहुत देर के बाद किसी पुरुष के आगमन को सूचित करता है ।
जिस दिन किसी भक्ष्य इष्य के साथ शकुन दिखाई दे, उस दिन द्रव्य का ही है। यदि जिपुरिया शुभ शकुन भी दिखाई दे तो
यदि विदिशा में स्थित दीप्त शकुन वाम भाग में स्थित अन्य शकुन के द्वारा शब्द करे तो उस दिशा में उक्त पुरुष के द्वारा किसी स्त्री का संयोग सूचित करता है।
शाका शकुन अपने से पाँचवों दीप्त दिशा में स्थित दीप्त शकुन द्वारा शब्दायमान हो तो उस दिशा में स्थित पुरुष का आगमन कहता है। उससे विपरीत (दीप्त शकुन अपने से पाँचवीं शान्त दिशा में स्थित शान्त शकुन द्वारा शब्दायमान हो तो दोष करने वाला होता है।
मध्य स्थित शकुन चाम पार्थगत शकुन के द्वारा शब्दायमान हो तो आत्मीय जनों में और दक्षिण पार्थगत शकुन के द्वारा शब्दायमान हो तो शत्रुओं से भय को सूचित करता है तथा ये सभी एक ही समय में यदि बराबर शब्द करें तो होने वाले मरण को सुभित करते हैं।
यदि वृक्ष के अप्रभाग पर शकुन बैठा हो तो गजारूढ़ मनुष्य का, रोज के मध्य में शकुन बैठा हो तो अश्वारूप्य मनुष्य का और पृक्ष के मूल में शकुन बैठा हो तो रथारूद मनुष्य का आगमन सूचित करता है। यदि लम्बी यस्तु पर शकुन बैठा हो तो नरारूद मनुष्य का, कमलपुष्प पर बैठा हो तो नाव का और छिराय भाग कले वस्तु पर बैठा हो तो पालकी का आगमन सूचित करता है।
किसी उच्च प्रदेश (पर्वत आदि पर शकुन बैठा हो तो शकटारूद मनुष्य का और छाया में शकुन बैठा हो तो असं पुरुष का आगमन सूचित करता है। पूर्व आदि दिशा और आग्नेय आदि विदिशा में पूर्वोक्त कुन हो तो क्रम से एक, तीन, पाँच और सात दिन में शुभाशुभ फल प्रदान करते हैं। जैसे पूर्व दिशा में शकुन बैठे हों तो एक दिन में तथा उत्तर दिशा में बैठे हो तो सात दिन में शुभाशुभ फल देते हैं। आग्नेय कोप में शकुन बैते हो तो एक दिन में, वैश्य कोण में बैठे हो जो तीन दिन में, पापण्य कोण में बेते हो तो पाँच दिन में और ईशान कोष में शकुन बैते हो तो सात दिन में शुभाशुभ फल प्रदान करते हैं।
इन्द्र, अग्नि, पप, राक्षस, वरुण, वायु, चन्द्रमा, शिव-ये क्रम से पूर्व आदि आत दिशाओं के स्वामी होते हैं। उनमें पूर्व आदि दिसा पुरुषमंज्ञक और आग्नेय आदि विदिशा खोसंज्ञक हैं।
अग्रिम अध्याय के वैयति इत्यादि आ लोक में लेख की प्राप्ति की गई है। बसेकी किसके पा होती है, उसको यहाँ पर स्पार कर रहे हैं। पूर्व दिशा में कुछ के उपाय पते पर आग्नेय कोण में शकुन हो पो बात के पते पर पह पपदे और बोहोराले धान किये हुये
पूर्व आदि दिशाओं में दृष्ट शकुन का शुभाशुभ फल किस देश में प्राप्त होगा, उसको अब स्पष्ट करते हैं। पूर्व दिशा में दृष्ट शकुन का फल युद्धादि में, आग्नेय दिशा में दृष्ट शकुन का फल अग्नि के समीप में, दक्षिण दिशा में दृष्ट शकुन का फल किसी प्रकार के शब्दयुत देश में, नैत्य कोण में दूर सकुन का फल लड़ाई के स्थान में, पश्चिम दिशा में दृष्ट शकुन का फाल जलस्थान में, वायव्य कोष में दृष्ट शकुन का फरत बन्धनादि प्रदेश में, उत्तर दिशा में दृष्ट शकुन का फल वेदध्यनिस्थान में और इंसान कोष में दृए शकुन का फल गायों के शब्दों से समन्वित स्थान में प्राप्त होता है। पूर्व में लात, दक्षिण में पीला, पधिम में काला और उत्तर में सफेद वर्ष समझना चाहिये तया विदिशा में मिश्रित वर्ष होते हैं। जैसे- आग्नेय कोण में रक्त-पीत, नैऋत्य कोण में धीत-कृष्ण, नापन्य में कृष्ण-सित और ईशान कोण में मित-एक वर्ष समझना चाहिये।
पूर्व दिशा में शकुन हो तो ध्वजचिढ़ विशिष्ट स्थान में, आग्नेय कोण में हो तो अग्निदग्ध स्थान में, दक्षिण में हो तो श्मशान में, नैऋत्य में हो तो गुहा में, पश्चिम में हो तो जलप्राय स्थान में, वायव्य कोण में हो तो पर्वत पर और उत्तर में शकुन हो तो गहर में संयोग (शुभ शकुन में संयोग तथा भय (अशुभ शकुन में भय जानना चाहिये। अथवा शुभ शकुन संसूचित कार्य शुभ स्थान में और अशुभ शकुन संसूचित कार्य अशुभ स्थान में होते हैं।
पूर्व में बड़ी, आग्नेय कोण में कुमारी, दक्षिण में अनहोन, नैऋत्य कोण में दुर्गन्धा, पद्धिम में नील वल वाली, वायव्य कोण में निन्दनीय, उत्तर में लम्बी और ईशान कोण में रण्डा खी का निवास होता है। विदिशा खीसंज्ञक है: अतः कोई आचार्य ईशान कोण में नील यख वाली निन्दनीय और वायव्य कोण में लम्बी विधवा स्त्री रहती है-ऐसा अर्थ करते हैं।
प्रश्नकाल में शकुन या प्रश्नकर्ता पूर्व दिन में हो तो रजतु, आग्नेय कोप में सुवर्ण, दक्षिण में पीड़ित, नैर्मात्य में खो, पश्चिम में बकरा, पायध्य में सवारी, उत्तर में यज्ञ और ईशान कोण में शकुन या प्रश्नकर्ता हो तो गोकुलसम्बन्धी प्रश्न कहना चाहिये। पूर्व में बढ़, आग्नेय कोण में रात पृथ, दक्षिण में लोध्र, नैर्मात्य कोण में छिद्रसहित बाँस, पद्मिम में आम, पापण्य कोण में खेर, उसर में बेल और ईशान कोण में अर्जुन वृक्ष होता है।
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