पूर्व प्रावेशिको पुत्वा पुनः प्रास्थानिको भवेत्। सुखेन सिद्धिमीच प्रवेशे तद्विपर्ययात् ॥
यदि यात्राकाल में पहले प्रवेशकात्तिक शकुन होकर बाद में पाशकालिक शकुन
हो तो सुखपूर्वक कार्य की सिद्धि होती है तथा गृहप्रवेश आदि काल में इसके विपरीत
(पहले
शकुन होकर बाद में प्रवेशकालिक शकुन हो तो सुखपूर्वक
कार्य की सिद्धि होती है।
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