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बृहत्संहिता • अध्याय 86 • श्लोक 28
द्वन्द्वरोगार्दितत्रस्ताः कलहामिषका‌ङ्क्षिणः । आपगान्तरिता मत्ता न ग्राह्याः शकुनाः क्वचित् ॥
द्वन्द्व ( सारसभित्र नर-मेदिन का जोड़ा), रोग से पीड़ित, भीत, कलह करने की इच्छा वाले, मांसाभिलाषी, नदी के दूसरे किनारे पर स्थित और ऋतुकाल के कारण सदर्प शकुनों का ग्रहण नहीं करना चाहिये।
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