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बृहत्संहिता • अध्याय 86 • श्लोक 52
पश्चिमे शर्वरीभागे नप्तृकोलूकपिङ्गलाः । सर्व एव विपर्यस्ता प्राह्याः सार्थेषु योषिताम् ॥
अन्त भाग में नाजूक, उल्लू और पिङ्गता को यात्रा की तरह यह करना चाहिये, किन्तु खियों के लिये उपर्युक्त समस्त शकुन विपरीतक्रमण करना चाहिये।
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