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बृहत्संहिता • अध्याय 86 • श्लोक 80
व्यायामशिश्चिनिकूजितकलहाम्भोनिगडमन्त्रगोशब्दाः । वर्णास्तु रक्तपीतककृष्णसिताः कोणगा मिश्राः ॥
पूर्व आदि दिशाओं में दृष्ट शकुन का शुभाशुभ फल किस देश में प्राप्त होगा, उसको अब स्पष्ट करते हैं। पूर्व दिशा में दृष्ट शकुन का फल युद्धादि में, आग्नेय दिशा में दृष्ट शकुन का फल अग्नि के समीप में, दक्षिण दिशा में दृष्ट शकुन का फल किसी प्रकार के शब्दयुत देश में, नैत्य कोण में दूर सकुन का फल लड़ाई के स्थान में, पश्चिम दिशा में दृष्ट शकुन का फाल जलस्थान में, वायव्य कोष में दृष्ट शकुन का फरत बन्धनादि प्रदेश में, उत्तर दिशा में दृष्ट शकुन का फल वेदध्यनिस्थान में और इंसान कोष में दृए शकुन का फल गायों के शब्दों से समन्वित स्थान में प्राप्त होता है। पूर्व में लात, दक्षिण में पीला, पधिम में काला और उत्तर में सफेद वर्ष समझना चाहिये तया विदिशा में मिश्रित वर्ष होते हैं। जैसे- आग्नेय कोण में रक्त-पीत, नैऋत्य कोण में धीत-कृष्ण, नापन्य में कृष्ण-सित और ईशान कोण में मित-एक वर्ष समझना चाहिये।
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