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बृहत्संहिता • अध्याय 86 • श्लोक 44
रुतकीर्तनदष्टेषु भारद्वाजाजवर्हिणः । धन्या नकुलचाषी च सरटः पापदोऽधतः ॥
भारद्वाज, बकरा, मपूर-इन शब्द कीर्तन और देखना धन्य है तथा नेता, चाप और घरट-इनका आगे में आना अग्रुप है।
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