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बृहत्संहिता • अध्याय 86 • श्लोक 55
तावेव तु यथाभागं प्रशान्तरुतचेष्टितौ । शकुनी शकुनद्वार संज्ञितावर्थसिद्धये ॥
परिपसंजक शकुन होने पर गेमन करने वाले का नाश होता है; किन्तु वे दोनों शकुन यथाभाग (दक्षिण भागे वाले दक्षिण भाग में और वाम भाग वाले वाम भाग में) स्थित होकर शान्तिपूर्वक शब्द करें तो 'शकुनद्वार' संज्ञक होते हैं। इनमें गमन करने वाले के अभीष्ट अर्थ की सिद्धि होती है।
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