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बृहत्संहिता • अध्याय 86 • श्लोक 81
चिह्न ध्वजो दग्धमथ श्मशानं दरी जलं पर्वतयज्ञपोषाः । एतेषु संयोगभयानि विन्द्यादन्यानि वा स्थानविकल्पितानि ॥
पूर्व दिशा में शकुन हो तो ध्वजचिढ़ विशिष्ट स्थान में, आग्नेय कोण में हो तो अग्निदग्ध स्थान में, दक्षिण में हो तो श्मशान में, नैऋत्य में हो तो गुहा में, पश्चिम में हो तो जलप्राय स्थान में, वायव्य कोण में हो तो पर्वत पर और उत्तर में शकुन हो तो गहर में संयोग (शुभ शकुन में संयोग तथा भय (अशुभ शकुन में भय जानना चाहिये। अथवा शुभ शकुन संसूचित कार्य शुभ स्थान में और अशुभ शकुन संसूचित कार्य अशुभ स्थान में होते हैं।
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