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बृहत्संहिता • अध्याय 86 • श्लोक 12
प्रामारण्यप्रचाराद्यं सञ्चिक्षिप्सुरहं लोकादेवोपलक्षयेत् । वच्मि यात्रामात्रप्रयोजनम् ॥
गाँव में रहने वाले, वन में रहने वाले और उभयचारी शाकुनों को लोकव्यवहार से जानना चाहिये। संक्षेप की इच्छा वाला मैं (वराहमिहिर) अब यात्रा में प्रयोजनीय शाकुनों को कहता हूँ।
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