गाँव में रहने वाले, वन में रहने वाले और उभयचारी शाकुनों को लोकव्यवहार से जानना चाहिये। संक्षेप की इच्छा वाला मैं (वराहमिहिर) अब यात्रा में प्रयोजनीय शाकुनों को कहता हूँ।
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