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बृहत्संहिता • अध्याय 86 • श्लोक 14
मुक्तप्राप्तैष्यदर्कासु फलं दिक्षु तथाविधम् । अङ्गारदीप्तधूमिन्यस्ताश्च शान्तास्ततोऽपराः ॥
सूर्योदय से एक प्रहर दिन उठे तक ऐशानी दिशा मुक्तसूर्या, पूर्वदिशा प्राप्तसूर्या और अग्नि दिशा ऐष्यत्सूर्या होती है। एक प्रहर के बाद दो पहर दिन उठे तक पूर्वदिशा मुक्तसूर्या, आग्नेयी दिशा प्राप्तसूर्या और दक्षिण दिशा ऐष्यत्सूर्या होती है। इसी प्रकार शेष छ: प्रहरों में भी जानना चाहिये। मुक्तसूर्या अङ्गारिणी', प्राप्तसूर्या 'दीप्ता', ऐष्यत्सूर्या 'पूमिनी' और शेष पाँच दिशायें 'शान्ता' कहलाती हैं।
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