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बृहत्संहिता • अध्याय 86 • श्लोक 74
शान्तः पश्चमदीप्तेन दिग्नरागमकारी वा विरुतो विजयावहः । दोषकृत् तद्विपर्यये ॥
शाका शकुन अपने से पाँचवों दीप्त दिशा में स्थित दीप्त शकुन द्वारा शब्दायमान हो तो उस दिशा में स्थित पुरुष का आगमन कहता है। उससे विपरीत (दीप्त शकुन अपने से पाँचवीं शान्त दिशा में स्थित शान्त शकुन द्वारा शब्दायमान हो तो दोष करने वाला होता है।
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