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बृहत्संहिता • अध्याय 86 • श्लोक 17
क्षणतिथ्युडुवाताकैर्देवदीप्तो यथोत्तरम् । क्रियादीप्तो गतिस्थानभावस्वरविचेष्टितैः ॥
क्षण (दारुण और उग्रसंज्ञक नक्षत्र के मुर्त) में दृष्ट शकुन क्षणदीप्त; तिथियों ( चतुर्यो, षष्ठी, अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी) में दृष्ट शकुन तिथिदीप्त; नक्षत्रों (मूल) ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, पूर्वात्रय, भरणी और मघा में दृष्ट शकुन नक्षत्रदीप्त; वात ( भयंकर, खर, कठोर और प्रतिलोम वायु) में दृष्ट शकुन वायुदीप्त एवं सूर्याभिमुख स्थित शकुन सूर्यदीप्त-ये पाँच देवदीप्त हैं। ये सभी दीप्त यथोत्तर क्रम से दीप्त हैं; जैसे-क्षणदीप्त से तिथिदीप्त, तिथिदीप्त से नक्षत्रदीप्त, नक्षत्रदीप्त से वायुदीप्त और वायुदोप्त से सूर्यदीप्त अधिक दीप्त है। गति, स्थान, भाव, स्वर और चेष्टा-ये क्रिया- दीप्त हैं। ये भी यथोत्तर क्रम से दीप्त होते हैं।
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