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अध्याय 104 — अथ ग्रहगोचराध्यायः

बृहत्संहिता
64 श्लोक • केवल अनुवाद
जिस प्रकार धागों से वर्जित, प्रकटित छिद्र वाले पुरातन रत्न नवीन धागों से योजित करने पर बहुधा भूषित करने के लिये समर्थ होते हैं, उसी प्रकार सूत्र (अक्षररचनारूप वृत्तवन्ध ) से वर्जित, प्रकटित दोष वाले, पुरातन, नवीन गुणों (सुन्दर वस्तु द्रव्य, वृत्तबन्धों) से योजित शाख भी भूषित करने के लिये समर्थ होते हैं।
बहुधा इस संसार में ग्रहगोचर का व्यवहार किया जाता है। इसलिये अनेक छन्दों के द्वारा उसके फलों को कहता हूँ। आर्यगण हमारे मुख-चापल्य को क्षमा करें। यह आर्यावृत्तों के अन्तर्गत मुखचपला वृत्त है।
जिन्होंने माण्डव्य ऋषि की वाणी सुनी है, उनको मेरी वाणी अच्छी नहीं लगेगी अथवा इस तरह कहना भी उचित नहीं है; क्योंकि अपनी साध्वी खी उस प्रकार पुरुषों को प्रिय नहीं लगती, जिस प्रकार जघनचपला (आसाध्वी वेश्या प्रिय होती है।
जन्मराशि से छठी, तीसरी या दसवीं राशि में सूर्य, तीसरी, दशवीं, छठी, सातवीं या पहली राशि में चन्द्रमाः सातवों, नथीं, दूसरी या पाँचवीं राशि में गुरु: छठी या तीसरी राशि में मंगल और शनि: छठी, दूसरी, चौधी, दशवीं या आठयों राशि में बुध तथा ग्यारहयों राशि में सभी ग्रह शुभ होते हैं। सातयों, छठी और दशवीं राशि स्थित शुक सिंह की तरह भय करने वाला होता है। यह शार्दूलविक्रीडित छन्द भी है।
यदि सूर्य जन्मराशि में हो तो उपद्रव, धन का नाश, पेट का रोग और मार्ग में भ्रमण; द्वितीय राशि में हो धन का नाश, दुःख, सभी कार्यों का नाश और नेत्ररोग; तृतीय राशि में हो तो स्थानलाभ, धन- उमूह से युत, आनन्दयुत और शत्रु का नाश तथा चतुर्थ राशि में सूर्य हो तो रोग और माला को धारण करने वाली स्त्री के उपभोग में बार-बार विध्न उत्पन्न करता है। यह सम्परा उन्द है।
यदि सूर्य जन्मराशि से पञ्चम राशि में हो तो रोग और शत्रु-जनित बहुत प्रकार की पौड़ा; षष्ठ में हो तो रोग, शत्रु और शोक का नाश, सप्तम में हो तो मार्ग में भ्रमण, पेट के रोग का भय और दुःखी तथा अष्टम में हो तो रोग और भय करता है एवं अपनी खी भी सुवदना (अच्छी तरह बात नहीं करती है। यह सुवदना छन्द है।
यदि सूर्य जन्मराशि से नवम राशि में हो तो आपत्ति, दोनता और धन के प्रयोग आदि से विघ्न; दशम में हो तो कठिन विजय और कार्य की सिद्धिः एकादश में हो तो विजय, स्थानलाभ, पूजा और रोग का नाश तथा द्वादश राशि में हो तो सुन्दर स्वभाव वालों की क्रिया फलवतों होती है, दुर्जनों को नहीं। यह सुवृत्ता छन्द है।
यदि चन्द्रमा जन्मराशि में हो तो अन्न, उत्तम शय्या और वस्त्र को देता है। द्वितीय में हो तो पूजा और धन का नाश तथा विप्न करता है। तृतीय में हो तो वस्त्र, धन, विजय और सुख का लाभ कराता है तथा जिसके चतुर्थ राशि में चन्द्र हो, उसको शिखरी (पर्वत) पर सर्प की तरह सब पर अविश्वास रहता है। यह शिखरिणी छन्द है।
यदि चन्द्रमा जन्मराशि से पञ्श्चम राशि में हो तो दौनता, रोग, शोक और मार्ग में विघ्न करता है। षष्ठ में हो तो धन और सुख को उत्पत्र तथा शत्रु और रोग का नास करता है। सप्तम में हो तो वाहन, पूजा, शय्या, भोजन और धन को करता है। अष्टम रासि में हो तो विना प्रयत्न ग्रहण किया हुआ सर्प किसको भय नहीं करता है? अर्थात् सबको भय करता है, उसी तरह अष्टमस्थित चन्द्र भी सबको भय करता है। यह मन्दाक्रान्ता छन्द है।
यदि चन्द्रमा नवम राशि में स्थित हो तो बन्धन, उद्वेग, खेद और उदररोग करता है। दशम में हो तो प्रभुता और कर्म की सिद्धि करता है। एकादश में हो तो धन की वृद्धि, मित्र के साथ समागम और धन का प्रमोद करता है तथा द्वादश राशि में चन्द्र हो तो पन की क्षति और बैल के सोंग, खुर आदि से पीड़ित करता है। यह वृषभचरित छन्द है।
यदि जन्मराशि में मंगल हो तो उपद्रव और द्वितीय में हो तो राजपीड़ा, कलहदोष, शत्रुदोष, धातुदोष, अग्नि, चोर, रोग- इन सबों से इन्द्रवज्र-सम कठोर मनुष्य को भी अतिशय उपघात करता है। यह उपेन्द्रवज्रा छन्द है।
यदि मंगल तृतीय राशि में हो तो चोर और कुमारों (अष्टवर्षीय बालकों) के द्वारा फल, आदेश, धन, ऊनी वस्र, खान से उत्पन्न द्रव्य और अन्य द्रव्यों का भी लाभ कराता है। यह उपजाति छन्द है।
यदि मंगल चतुर्थ राशि में स्थित हो तो ज्वर, उदररोग, रक्तविकार और निन्दित पुरुष के साथ समागम से दृढ़तापूर्वक अशुभ करता है। यह प्रसभ छन्द है।
• यदि मंगल जन्मराशि से पश्चम राशि में स्थित हो तो शत्रु, रोग, क्रोध, भय और पुत्र के द्वारा शोक होता है तथा जिस तरह वानर के शिर पर मालती-पुष्प अधिक देर तक स्थिर नहीं रहता है, उसी तरह उस मनुष्य की कान्ति भी बहुत देर तक स्थिर नहीं रहती है। यह मालती छन्द है।
जन्मराशि से षष्ठ स्थान में मंगल हो तो शत्रुभय और कलह से रहित, सुवर्ण, प्रवाल और ताम्बे का लाभ होता है तथा उसको दूसरे मनुष्य का मुखविकार कभी नहीं देखना पड़ता। यह अपरवक्त्रा छन्द है।
उदररोग होता है। अष्टम में हो तो निकलते हुये रुधिर से विवर्ण शरीर, धन और मान का नाश करता है। जिसके नवम में मंगल हो वह पराभव, अर्थनाश आदि से शरीर में निर्बलता और धातुओं के क्षय से मन्दगति वाला हो जाता है। यह विलम्बितगति छन्द है।
यदि जन्मराशि से दशम स्थान में मंगल हो तो मध्यम फल और एकादश में हो तो अनेक प्रकार के धन की प्राप्ति और जय होती है तथा पुष्पित अग्रभाग वाले वृक्षों से युत वन में भ्रमर की तरह लोगों में प्रधान होकर भोग करता है। यह सुपुष्पिताग्र छन्द है।
जिसके जन्मराशि से व्ययस्थान में मंगल हो, वह इन्द्र के वश में उत्पत्ति के गर्व से युत होने पर भी अनेक प्रकार के खर्च, अनेक प्रकार के उपद्रव, स्त्री के ऊपर क्रोध, पित्त और नेत्ररोगों से पीड़ित होता है अर्थात् श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न होकर भी मनुष्य अनेक प्रकार के खर्च आदि से पीड़ित होता है। यह इन्द्रवंशा छन्द है।
जिसके जन्मराशि में बुध हो, यह मनुष्य कठोर वाक्य, चुगुलखोरी, शत्रुता और पारस्परिक भेद से नष्ट धन वाला होता है तथा उसके शुभागमन में भी कुशलवार्ता कोई नहीं सुनता है। यह स्वागता छन्द है।
पदि जन्मति से द्वितीय में बुध हो तो अनादर और धन का लाभ, तृतीय में हो तो मित्र का लाभ कराने कला, राजा और शत्रु के भय से शङ्कित होकर अपने दुद्धरित्रों के कारण भागने वाला होता है। यह दुरुपद छन्द है।
यदि जन्मरति से चतुर्थ में बुध हो तो अपने जन और बन्धुओं की वृद्धि एवं धन को प्राप्ति होती है। पञ्चम में हो तो पुत्र और खी के साथ कलह और अपने उद्वेग के कारण सुन्दरी खी कर भी उपभोग नहीं होता है। यह रुचिरा छन्द है।
यदि जन्मराशि से छड़ी राशि में बुध हो तो सौभाग्य, विजय और उत्रति कराता है। सातवीं राशि में हो तो चिवर्णता और कलह कराता है। आठवीं राशि में हो तो विजय, पुत्र-वत्र और धन का लाभ तथा हर्षित करने वाली निपुणता का लाभ कराता है। यह प्रहर्षणों छन्द है।
यदि नवीं राशि में बुध हो तो विघ्नकारक, दशवीं राशि में हो तो शत्रुनाशक, घन देने वाला तथा खी, शय्या, स्ली के सोने का सुन्दर गृह, ऐतिहासिक वार्ता और सुन्दर आस्तरण (बिछौना) देता है। यह दोधक छन्द है ।
यदि जन्मराशि से ग्यारहवीं राशि में बुध स्थित हो तो धन, पुत्र, सुख, खी, मित्र उथा बाहन को प्राप्ति करने वाला, सन्तुष्ट और मधुर बोलने वाला होता है। यदि बारहवीं राशि में बुध हो तो शत्रु, अनादर और रोग से पीड़ित होता है तथा माला धारण करने बाली सी के संगम का सुख भोगने के लिये समर्थ नहीं होता है। यह मालिनी छन्द है॥
जिसके जन्मराशि में बृहस्पति हो, उसके धन और बुद्धि का नाश, स्थान का नारा तथा वह अनेक प्रकार के विरोध से युत होता है। जिसके द्वितीय राशि में बृहस्पति हो, वह धनों को प्राप्त करके शत्रुरहित होकर स्त्री के मुखकमल पर भ्रमर की तरह विलास करता है। यह भ्रमरविलसिता छन्द है।
जिसके तृतीय स्थान में बृहस्पति हो, वह स्थाननाश और कायों के नारा से पीड़ित चित्त वाला होता है। चतुर्थ स्थान में हो तो अनेक प्रकार के क्लेश और बन्धुओं से पीड़ित चित्त वाला होता है तथा उसको न तो गाँव में और न ही मतवाले मयूरों से युत वन में शान्ति मिलती है। यह मत्तमबूर छन्द है।
पञ्चम भवनगत बृहस्पति परिजन, धर्मादि, पुत्र, हाथी, घोड़ा और बैल का लाभ तथा सुवर्ण, नगर, गृह, स्त्री, वत्र और मणियों के समूहों का लाभ करता है। यह मणिगुणनिकर छन्द है।
जिसके छठे स्थान में बृहस्पति हो, उसके गृह में सखी का मुख तिलक से उज्ज्वल नहीं होता तथा मसूर और कोकिलों से शब्दायमान, मृगों के कूदने फाँदने से और हरिण शिशुओं से रम्य वन भी उसके मन के लिये आनन्ददायक नहीं होता है। यह हरिणप्लुत छन्द है।
यदि बृहस्पति सातवीं राशि में स्थित हो तो शय्या, सुरतभोग, धन, भोजन, वाहन तथा ललित पद वाली वाणी और बुद्धि करता है। यह ललितपद छन्द है।
यदि जन्मराशि से अष्टम राशि में बृहस्पति हो तो बन्धन, पोड़ा, कठोरता, शोक, मार्ग में क्लेश और मृत्युसम रोग करता है। नवम राशि में हो तो समस्त कार्यों में निपुणता, आदेश, पुत्र, कार्य और अर्थ की सिद्धि तया धान्ययुत भूमि का लाभ करता है। यह शालिनी छन्द है।
दशम राशि में स्थित बृहस्पति स्थान, आरोग्य और धन का नाश करने वाला होता है। एकादश राशि में स्थित बृहस्पति स्थान, आरोग्य और धन को देने वाला होता है। द्वादश राशि में स्थित बृहस्पति हो तो रथ पर चढ़ा हुआ मनुष्य भी मार्ग में कुपथ-गमन के कारण दुःख भोगता है। यह रथोद्धता छन्द है।
जन्मराशि में स्थित शुक्र कामदेव के उपकरणों (शयन, भूषण, आच्छादन, अनुलेपन, गीत, बाद्य और नृत्यों), चित्ताह्लादक, सुगन्ध द्रव्य, पुष्प और वख से लाभ कराता है तथा शय्या, गृह, आसन और भोजनों से युत पुरुष को मद्यपान से मतवाली विलासिनी खी के मुखकमल पर भ्रमरत्व का अनुभव कराता है। यह विलासिनी छन्द है।
यदि द्वितीय राशि में शुक्र हो तो सन्तान, धन, धान्य, राजप्रियता और बन्धुओं से हित कार्यों को प्राप्त करके पुष्प और रत्नों से विभूषित होकर वसन्ततिलका वृक्ष के पुष्पसमान अति बेत बाल होने पर भी कामदेव की सेवा करता है। यह बसन्ततिलका छन्द है।
तृतीय राशिगत शुक्र प्रभुत्व, पत्र, मान, स्थान, समृद्धि, वख और शत्रु का नात करता है। अतुर्थ राशिगत शुक्रमि के साथ समागम तथा वि, इन्द्र और को करता है। यह वन्द है।
पञ्चम राशिगत शुक्र अधिक सन्तोष, बन्धुओं की प्राप्ति, पुत्र और धन का लाथ तथा शत्रु के सैन्यों में अनवस्थिति करता है। यह अनवसिता छन्द है।
षष्ठ राशिगत शुक्र अनादर, रोग और सन्नीग करता है। सप्तम राशिगत शुक्र रखी के सम्बन्ध को लेकर अनिष्ट करता है। अहम राशिगत शुक्र गृह और रख देने वाला तपा लक्ष्मीवती खी का लाभ कराने वाला होता है। यह तक्ष्मी छन्द है।
जिसके नमव राशि में शुक्र स्थित हो वह धर्म, स्त्री और सुख भोगने वाला तथा पन और वलों से युत होता है। जिसके दशम राशिगत शुक्र हो, वह मनुष्य परिमित भाषण करने पर भी अपमान और कलह का लाभ करता है। यह प्रमिताक्षरा छन्द है।
एका राशिगत शुक्र मित्र, धन, अत्र और सुगन्ध द्रव्य देने वाला होता है। द्वादश राशिगत शुक्र धन और पत्रों का लाभ कराने वाला होता है; किन्तु वख का लाभ स्थिर नहीं रखता। यह स्थिर छन्द है।
जिसके जन्मराति में शनि हो वह विष और अग्नि से पीड़ित, बन्धुओं से रहित, बन्धु का वध करने वाला, परदेश में जाने वाला, मित्र और गृह से रहित, धन और पुत्र से रहित, भ्रमणशील तथा दीन मुख वाला होता है। यह तोटक छन्द है।
जिस मनुष्य के चारवश जन्मराशि से द्वितीय राशि में शनि हो, यह रूप तया सुख से रहित शरीर पाता, अहंकाररहित और निर्बल होता है। अन्य विद्या आदि गुणों में धन को इकट्ठा करने पर भी मंशपत्र पर पतित जालविन्दु की तरह यह पर्याप्त नहीं होता और चिरकाल तक नहीं नहाता यह पतित छन्द है।
जिसके तृतीय राशि में शनि हो वह पन, नृत्य, परिवार, ऊँट, भैंस, घोड़ा, हाथी, गदहा, गृह, ऐश्वर्य, अति सौख्य और आरोग्य लाभ करता है तथा डरपोक होने पर भी योर चरित्रों के द्वारा प्रबल शत्रु को भी अपने वश में करता है। यह ललिता छन्द
जिसके चतुर्य गृह में शनि हो, वह मित्र, धन, खी आदि ( पुत्र और बन्धु) से रहित होता है तथा उसका चित्त सर्वत्र असाधु, दुह और भुजङ्ग (सर्प) के प्रयात (गमन) का अनुकरण करने वाला (अति कुटिल) होता है। यह भुजङ्गप्रयात छन्द रे
जिसके पक्षम राशिगत शनि हो वह पुत्र तथा धनों से रहित और कलहों से युत होता है। पाठ राशिगत शनि हो तो शत्रुरहित, नीरोग और सुन्दर ओठों से युत स्त्री के मुख का पान करने वाला होता है। यह पुटा छन्द है।
जिसके जन्मति से सप्तम मा अष्टम गृहगत शनि हो, वह मार्ग में गमन करता है तथा खी, पुत्र से हीन और दीन चेष्टा से गुत होता है। नवम राशिगत शनि हो तो पूर्ववत् फल होता है तथा द्वेष और हृदय के रोग से उसका वैश्वदेवो क्रिया आदि धर्म नष्ट होता है। यह वैखदेवी छन्द है गच्छति।
दशम राशिगत शनि हो तो कैर्म का लाभ तथा धन, विद्या और कीर्ति का नाश होता है। एकादश राशि में शनि हो तो कठोर स्वभाव तथा दूसरे की त्री और धन का लाभ होता है। द्वादश राशि में शनि हो तो शोक को ऊर्मि (तरंगों) को माला ( समुदाय) की प्राप्ति होती है। यह ऊर्मिमाला छन्द है।
जिस तरह वसन्तकाल में मेघसमुदाय से बहुत जल की वृष्टि होने पर भी कुडव ( प्रस्थांघ्रितुल्य पात्र) में बहुत जल नहीं होता है, उसी तरह शुभ करने वाला ग्रह काल और पात्र के अनुरूप फल करता है। यह वितान छन्द है।
रक्तपुष्प, सुगन्ध द्रव्य, समालम्भन (रक्तचन्दन आदि), ताम्बा, सोना और बैल से सूर्य तथा मंगल की; घेनु, सफेद पुष्प, चाँदी और मिष्टान से चन्द्र की; कामोद्दीपक द्रव्य ( गन्ध, पुष्प, धूप और बलि) से शुक्र की; काले द्रव्यों से शनि की; मणि, चाँदी और तिल-पुष्प से बुध की एवं पीले द्रव्यों (पुष्प, सुगन्ध द्रव्य और उपहारों) से बृहस्पति की भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। यदि ऊँचे स्थान से गिरे या क्रीड़ासक्त सर्पों में प्रवेश करे तो भो इस प्रकार पूजा से परितुष्ट ग्रहों के द्वारा पीड़ा नहीं होती है। यह भुजङ्गविजृम्भित छन्द है।
देवता और ब्राह्मणों की पूजा से, शान्ति, मन्त्रजप, नियम, दान और जितेन्द्रियत्व से तथा सुजनों से भाषण और उनके साथ समागम से अशुभ दृष्टिजन्य (गोचरोक्त सकल) दोषों का नाश करना चाहिये। यह उद्ता छन्द है।
सूर्य, मंगल राशि के पूर्वार्ध में एवं चन्द्र और शनि राशि के अन्त में शुभाशुभ फल देते हैं। जिस छन्द में आर्या के पूर्वार्ध सम दोनों अर्थ हो, उसको गीति और जिसका उत्तरार्ध सम दोनों अर्थ हो, उसको उपगीति छन्द कहते हैं। यह गीति और उपगीति का लक्षण है।
उपगीति की मात्राओं के गण की तरह या साधुओं के समागम की तरह बुध राशि के आदि और अन्त में समान फल देता है। अर्थात् जैसे उपगीति छन्द में दोनों अर्थ तुल्य लक्षण-लक्षित होते हैं तथा जैसे साधुओं का समागम सदा एक-सा रहता है, उसी तरह बुध राशि के आदि और अन्त में तुल्य फल देता है। यह उपगीति छन्द है ।
जिस तरह विषम गण में स्थित अन्तर्गुरु वाला (मध्य गुरु बाला जगण ) आर्या छन्द का और विषम स्थित (अप्रसत्र) गण (देवताविशेष) उत्तम पुरुषों का भी नारा करता है, उसी तरह विषम स्थित गुरु राशि के मध्य भाग में उत्तम पुरुषों का भी नारा करता है तथा जैसे आर्या छन्द के षष्ठ गण में स्थित जगण सर्वतपुत्व (चारो लघुता ) को प्राप्त होता है, उसी तरह पप्त राशिस्य गुरु जन को सर्वलघुत्व (लोगों में गौरवहीन) करता है। यह आर्या छन्द है।
जैसे संस्कृत में नकुंटक और प्राकृत में गीतक- ये दोनों छन्द समान प्रस्तार वाले होते हैं, उसी तरह बली शुभ फल देने वाला ग्रह बली अशुभ फल देने वाले ग्रह से और बली अशुभ फल देने वाला ग्रह बली शुभ फल देने वाले ग्रह से दृष्ट हो तो अपने-अपने शुभ और अशुभ फलों की समता करते हैं, अर्थात् न शुभ न अशुभ; अपितु मध्यम फल देते हैं। यह नर्कुटक छन्द है।
जिस तरह अन्धे के आगे कामयुक्ता त्री का विलास और कटाक्ष के साथ देखना व्यर्थ होता है, उसी तरह नीच राशिगत, शत्रु राशिगत, अस्त और शत्रु ग्रह से दृष्ट ग्रह के जो भी शुभ फल कहे गये हैं, वह सभी निष्फल होते हैं अर्थात् अशुभ फल की वृद्धि होती है। यह विलास छन्द है।
सूर्य के समान शनि का फल देता है तथा जिस प्रकार संस्कृत में आर्या गीति, प्राकृत में स्कन्धक के, संस्कृत में वैतालीय, प्राकृत में मागधी के और संस्कृत में आर्या, प्राकृत में गाथा के अनुगमन करती है, उसी प्रकार बुध छन्द (परचित्त-ग्रहण) से फल देता है। अर्थात् शुभ ग्रह से युत शुभ और पाप से युत पाप फल देता है।
जिस प्रकार सूर्य के किरण के संयोग से पित्त का प्रकोप बढ़ जाता है, उसी प्रकार सूर्य की किरणों के योग से अस्तगत शनि विकारयुत होकर अशुभ फल देने में अधिक बढ़ता है और मनुष्यों को तापित करता है; किन्तु पथ्य भोजन करने वाले आर्यों को उस प्रकार अशुभ फल नहीं देता है। यह पथ्या छन्द है।
जिस तरह मनोवृत्ति के संयोग से मुख का विकार मनोवृत्ति के समान होता है, अर्थात् प्रसत्र पन रहने से प्ररात्र मुख और दुःखित मन रहने से उदास मुख रहता है, उसी तरह यादृद्म शुभाशुभ ग्रह से युक्क चन्द्र होता है, तादृश शुभाशुभ फल करता है। अर्थात् शुभ ग्रह से सुत चन्द्र शुभ फल और पापग्रह से युत चन्द्र पापफल करता है। यह चक्र छन्द है।
जिस तरह श्लोक के चारो पादों में पश्चम तथा द्वितीय और चतुर्थ पाद में सप्तम अक्षर लघु होता है, उसी तरह प्रतिकूल ग्रहों से मनुष्य लघुता को प्राप्त करता है। यह श्लोक छन्द है।
जिला वाव में लघु असर भोवा (पादान्त) में व्यवस्थित होने से गुर हो जाता है, उसी ताह जो पुरुष स्वभाव से तमु (दूषित फुल में उत्पत्र) और (न्द्रिय) में है अर्थात है, वह भी अनुकूल में होता है। यह हुए न्द है।
जिस तरह अविधान से बेताल-सिद्धि के लिये किया हुआ कर्म साधकों का हो नाश करता है, उसी तरह पण्डित लोग असुरियत ग्रहों के आने पर आत्मवृद्धि के लिये जिस कर्म का प्रारम्भ करते हैं, वह कर्म ही उनका नाश करता है। यह वैतालीय छन्द है।
सुस्थित प्रहों को देखकर जो राजा शत्रु के ऊपर आक्रमण करता है, वह अल्प सैन्य से युत होने पर भी औपछन्दसिक वृत (बेदोक्त क्रिया) का पार जाता है। यह औपच्छन्दसिक छन्द है।
बुध के लग्न या दिन में हरित मणि, पृथ्वी, सुगन्ध द्रव्य, साधारण कार्य, नाटक, शाख, विज्ञान, काव्य, सभी कलायें, द्रव्यों का संयोग, मन्त्रक्रिया, धातुक्रिया, किसी के साथ विवाद, निपुणता, पुण्य, व्रतग्रहण, दूत, आयु के लिये हित कार्य, माया, मिथ्या, स्नान ( पुण्यस्नान आदि), शीघ्र होने वाला कार्य, देर में होने वाला कार्य, मध्य समय में होने वाला कार्य, परचित्त-ग्रहणपूर्वक प्रचण्ड वृद्धि में पदन्यास के अनुकरण करने वाला कार्य अर्थात् कोई हस्व, कोई दीर्घ और कोई मध्यम कार्य-इन सब वस्तुओं से सम्बन्धित कर्म की सिद्धि होती है।
बृहस्पति दिन में सोना, चाँदी, घोड़ा, हाथी, बैल, वैद्य, औषधि, ब्राह्मणों का तर्पण, पितृश्राद्ध, देवताओं का कार्य, पुरःस्थित (पदाति), छत्र, चामर, भूषण, राजा, देवगृह, देवप्रतिष्ठा, गृहप्रतिष्ठा, धर्माश्रय, मंगल, शास्त्र, सुन्दर, बलप्रद, सत्य वचन, व्रत ( चान्द्रायण आदि), हवन, धन-इन सभी वस्तुओं से सम्बन्धित कार्य वर्णक (सर्प आदि) से युत मनोहर दण्ड की तरह सिद्ध और सुन्दर होते हैं। यह वर्णकदण्डक छन्द है।
शनिवार में भैंस, छाग, ऊँट, कृष्णलोह (शत्र, आयुध आदि), मृत्य, वृद्ध, नोच, पक्षी, चोर, बन्धन आदि जानने वाले, नम्रता से रहित, फूटा भाण्ड, हस्त्यपेक्षा ( हाथी के ग्रहणादि), विघ्न के कारण इनके आश्रित सभी कार्य सिद्ध होते हैं। इन पूर्वोक्त नियमों को छोड़कर समुद्र में जाने पर भी जलबिन्दु की भी प्राप्ति नहीं होती है। यह समुद्रदण्डक छन्द है।
बहुत विस्तीर्ण छन्दों के प्रस्तारों को जानकर भी इतना हो कार्य होता है। अतः वराहमिहिर आचार्य ने कर्णसुखजनक यह छन्दसंग्रह कहा है। यह विपुला आर्या छन्द है
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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