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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 59
प्रारब्धमसुस्थितैर्महर्यत् कर्मात्मविवृद्धये बुधैः । विनिहन्ति तदेव कर्म तान् वैतालीयमिवायथाकृतम् ॥
जिस तरह अविधान से बेताल-सिद्धि के लिये किया हुआ कर्म साधकों का हो नाश करता है, उसी तरह पण्डित लोग असुरियत ग्रहों के आने पर आत्मवृद्धि के लिये जिस कर्म का प्रारम्भ करते हैं, वह कर्म ही उनका नाश करता है। यह वैतालीय छन्द है।
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