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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 55
सौरोऽर्करश्मियोगात् सविकारो लब्धवृद्धिरधिकतरम् । पित्तवदाचरति नृणां पथ्यकृतां न तु तथाऽऽर्याणाम् ॥
जिस प्रकार सूर्य के किरण के संयोग से पित्त का प्रकोप बढ़ जाता है, उसी प्रकार सूर्य की किरणों के योग से अस्तगत शनि विकारयुत होकर अशुभ फल देने में अधिक बढ़ता है और मनुष्यों को तापित करता है; किन्तु पथ्य भोजन करने वाले आर्यों को उस प्रकार अशुभ फल नहीं देता है। यह पथ्या छन्द है।
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