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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 21
चतुर्थगे स्वजनकुटुम्बवृद्धयो धनागमो भवति च र रेश्मिजे । सुतस्थिते तनयकलत्रविषहो निषेवते न च रुचिरामपि खियम् ॥
यदि जन्मरति से चतुर्थ में बुध हो तो अपने जन और बन्धुओं की वृद्धि एवं धन को प्राप्ति होती है। पञ्चम में हो तो पुत्र और खी के साथ कलह और अपने उद्वेग के कारण सुन्दरी खी कर भी उपभोग नहीं होता है। यह रुचिरा छन्द है।
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