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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 52
अशुभनिरीक्षितः शुभफलो बलिना बलवा- शुभदृग्विषयोपगतः । नशुभफलप्रदश्च अशुभशुभावपि स्वफलयोव्रजतः समता- मिदमपि गीतकं च खलु नर्कुटकं च यथा ॥
जैसे संस्कृत में नकुंटक और प्राकृत में गीतक- ये दोनों छन्द समान प्रस्तार वाले होते हैं, उसी तरह बली शुभ फल देने वाला ग्रह बली अशुभ फल देने वाले ग्रह से और बली अशुभ फल देने वाला ग्रह बली शुभ फल देने वाले ग्रह से दृष्ट हो तो अपने-अपने शुभ और अशुभ फलों की समता करते हैं, अर्थात् न शुभ न अशुभ; अपितु मध्यम फल देते हैं। यह नर्कुटक छन्द है।
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