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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 64
विपुलामपि बुद्ध्वा छन्दोविचितिं भवति कार्यमेतावत् । श्रुतिसुखदवृत्तसंग्रहमिममाह वराहमिहिरोऽतः ॥
बहुत विस्तीर्ण छन्दों के प्रस्तारों को जानकर भी इतना हो कार्य होता है। अतः वराहमिहिर आचार्य ने कर्णसुखजनक यह छन्दसंग्रह कहा है। यह विपुला आर्या छन्द है
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