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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 18
नानाव्ययैर्द्वादशगे महीसुते सन्ताप्यतेऽनर्थशतैश्च मानवः । स्त्रीकोपपित्तैश्च सनेत्रवेदनैयोंऽपीन्द्रवंशाभिजनेन गर्वितः ॥
जिसके जन्मराशि से व्ययस्थान में मंगल हो, वह इन्द्र के वश में उत्पत्ति के गर्व से युत होने पर भी अनेक प्रकार के खर्च, अनेक प्रकार के उपद्रव, स्त्री के ऊपर क्रोध, पित्त और नेत्ररोगों से पीड़ित होता है अर्थात् श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न होकर भी मनुष्य अनेक प्रकार के खर्च आदि से पीड़ित होता है। यह इन्द्रवंशा छन्द है।
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