मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 26
स्थानभ्रंशात् कार्यविधाताच्च तृतीयेऽ- नेकैः क्लेशैर्वन्युजनोत्यैश्च चतुर्थे । जीवे शान्तिं पीडितचित्तश्च स विन्देद् नैव प्रामे नापि चने मत्तमयूरे ॥
जिसके तृतीय स्थान में बृहस्पति हो, वह स्थाननाश और कायों के नारा से पीड़ित चित्त वाला होता है। चतुर्थ स्थान में हो तो अनेक प्रकार के क्लेश और बन्धुओं से पीड़ित चित्त वाला होता है तथा उसको न तो गाँव में और न ही मतवाले मयूरों से युत वन में शान्ति मिलती है। यह मत्तमबूर छन्द है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
बृहत्संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

बृहत्संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें