जिसके तृतीय स्थान में बृहस्पति हो, वह स्थाननाश और कायों के नारा से पीड़ित चित्त वाला होता है। चतुर्थ स्थान में हो तो अनेक प्रकार के क्लेश और बन्धुओं से पीड़ित चित्त वाला होता है तथा उसको न तो गाँव में और न ही मतवाले मयूरों से युत वन
में शान्ति मिलती है। यह मत्तमबूर छन्द है।
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