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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 30
बन्यं व्याधिं चाष्टमे शोकमुत्रं मार्गक्लेशान् मृत्युतुल्यांश्च रोगान् । नैपुण्याज्ञापुत्रकर्मार्थसिद्धिं धर्मे जीवः शालिनीनां च लाभम् ॥
यदि जन्मराशि से अष्टम राशि में बृहस्पति हो तो बन्धन, पोड़ा, कठोरता, शोक, मार्ग में क्लेश और मृत्युसम रोग करता है। नवम राशि में हो तो समस्त कार्यों में निपुणता, आदेश, पुत्र, कार्य और अर्थ की सिद्धि तया धान्ययुत भूमि का लाभ करता है। यह शालिनी छन्द है।
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