चारवशाद् द्वितीयगृहगे दिनकरतनये रूपसुखापवर्जिततनुर्विगतमदबलः
अन्यगुणेः कृतं वमुचयं तरपि खलु भव- त्यम्ब्विव वंशपत्रपतितं न बहु न च चिरम् ॥
जिस मनुष्य के चारवश जन्मराशि से द्वितीय राशि में शनि हो, यह रूप तया सुख
से रहित शरीर पाता, अहंकाररहित और निर्बल होता है। अन्य विद्या आदि गुणों में धन
को इकट्ठा करने पर भी मंशपत्र पर पतित जालविन्दु की तरह यह पर्याप्त नहीं होता और
चिरकाल तक नहीं नहाता यह पतित छन्द है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
बृहत्संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
बृहत्संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।