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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 7
रवावापदैन्यं रुगिति नवमे वित्तचेष्टाविरोधो जयं प्राप्नोत्युत्रं दशमगृहगे कर्मसिद्धिं क्रमेण । जयस्थानं मानं विभवमपि चैकादशे रोगनाशं सुवृत्तानां चेष्टा भवति सफला द्वादशे नेतरेषाम् ॥
यदि सूर्य जन्मराशि से नवम राशि में हो तो आपत्ति, दोनता और धन के प्रयोग आदि से विघ्न; दशम में हो तो कठिन विजय और कार्य की सिद्धिः एकादश में हो तो विजय, स्थानलाभ, पूजा और रोग का नाश तथा द्वादश राशि में हो तो सुन्दर स्वभाव वालों की क्रिया फलवतों होती है, दुर्जनों को नहीं। यह सुवृत्ता छन्द है।
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